ओरे मन कर्मेर कुहरे गेलो काल
ओ मन! कर्म के गड्ढे में मेरा समय बीत गया। स्वर्ग आदि सुखों की आशा में मैं कर्म के जाल में फँस गया, यह जाल मकड़ी के जाल जैसा फैला हुआ है।
उपवास के व्रत रखकर, शरीर को अनेक प्रकार से कष्ट देकर, मैंने राख में घी डाला। अपने ही दोष से मैं मारा गया। अब बुढ़ापे और मृत्यु के फंदे में फँसा हूँ, और उससे छूट नहीं पाया।
वर्णाश्रम धर्म का पालन करके, अनेक देवी देवताओं की पूजा करके, मैंने अपना जीवन मद और अहंकार में बिता दिया। फिर भी मन को शांति नहीं मिली, मैंने शांति रूपी धन नहीं पाया, मैंने श्री कृष्ण के चरणों की भक्ति नहीं की।
धिक्कार है मेरे इस जीवन को! धिक्कार है मेरे धन और अनुयायियों को! धिक्कार है मेरे जाति के अभिमान को! धिक्कार है मेरे कुल के गर्व को! धिक्कार है मेरे शास्त्राध्ययन को, इनमें हरि भक्ति को कोई स्थान नहीं मिला।