जीबे कृपा कोरि' गोलोकेर होरि
जीबे कृपा कोरि' गोलोकेर होरि
कल्याण-कल्पतरु में 65 भजन हैं, जिनके रचयिता भक्तिविनोद ठाकुर हैं, जो 13 अध्यायों में सजे हैं।
65 भजन · पृष्ठ 1 / 2
जीबे कृपा कोरि' गोलोकेर होरि
(आमि) जमुना-पुलिने, कदम्ब-कानने,
कबे श्री-चैतन्य मोरे कोरिबेन दोया
आमि तो' दुर्जन अति सदा दुराचार
भबार्णबे पो'डे मोरे आकुल पराण
बिषय-बासना-रूप चित्तेर बिकार
आमार समान हीन नाहि ए सोंसारे
ओरे मन भालो नाहि लागे ए सोंसार
ओरे मन बारिबार आशा केनो कोरो
ओरे मन भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा कोरो दूर
दुर्लभ मानब-जन्म लभिया सोंसारे
शरीरेर सुखे मन देहो जलञ्जलि
गोपीनाथ मम निबेदन शुनो
गोपीनाथ घुचाओ सोंसार-ज्वाला
गोपीनाथ आमार उपाय नाइ
श्री-राधा-कृष्ण-पद-कमले मन
कबे मोर शुभ-दिन होइबे उदोय
श्री-गुरु-बैष्णब-कृपा कोत दिने हबे
आमार एमोन भाग्य कोत दिने ह'बे
चैतन्य-चन्द्रेर लीला समुद्र अपार
कबे मोर मूढ मन छारि' अन्य ध्यान
हरि हरि कबे मोर हो'बे हेनो दिन
कबे मुइ बैष्णबे चिनिबो हरि हरि
कृपा कोरो' बैष्णब ठाकुर
कबे ह'बे हेनो दशा मोर
हा हा मोरा गौर-किशोर
हा हा कबे गौर-निताइ
कबे आहा गौराङ्ग बोलिया
कलि-कुक्कुर्-कदन् जदि चाओ (हे)
विभावरी शेष, आलोक-प्रवेश,
वन्दे वृन्दाटवी-चन्द्रं
जय जय श्री-चैतन्य पतित-पाबन
दीक्षा-गुरु कृपा कोरि' मन्त्र-उपदेश
मन रे, केनो मिछे भजिछो असार?
मन तुमि भालबास कामेर तरङ्ग
मन रे, तुमि बोरो सन्दिग्ध-अन्तर
मन, तुमि बोडै पामोर
मन, केनो ए संशोय
मन, तुमि पडिले कि छार?
मन, जोगी हो'ते तोमार बासना
ओहे भाइ, मन केनो ब्रह्म हो'ते चाय
मन रे, केनो आर बर्ण अभिमान
मन रे, केनो कोरो बिद्यार गौरब
रूपेर गौरब केनो भाइ
मन रे धन-मद नितान्त असार
मन तुमि सन्न्यासी साजिते केनो चाओ
मन तुमि तीर्थे सदा रत
देखो मन ब्रते जेन ना हओ आच्छन्न
मन तुमि बोरोइ चञ्चल
मन तोरे बोलि ए बारता
कि आर बोलिबो तोरे मन
केनो मन कामेरे नचाओ प्रेम-प्राय
आमि अति पामर दुर्जन
साधु-सङ्ग ना होइलो हाय
ओरे मन कर्मेर कुहरे गेलो काल
ओरे मन कि बिपद होइलो आमार
ओरे मन क्लेश-ताप देखि जे अशेष
ओरे मन बोलि शुनो तत्त्व-बिबरण
अपूर्ब बैष्णब-तत्त्व आत्मार आनन्द
चिज्-जोडेर द्वैत जिनि कोरेन स्थापन