एमोन दुर्मति
(प्रभु हे!)
दीनता और सच्चे आत्म-धिक्कार के भजन, जिनमें भक्ति से दूर बीते जीवन पर शोक है।
39 भजन
(प्रभु हे!)
दुर्लभ मानब-जन्म लभिया सोंसारे
हरि हरि! बड शेल मरमे रहिल
प्राणेश्वर! निवेदन एइ जन करे
ओरे मन भालो नाहि लागे ए सोंसार
आमि तो' दुर्जन अति सदा दुराचार
(प्रभु हे!) तुवा पदे ए मिनति मोर्
नदीया-नगरे गोरा-चरित अमृत
हरि हरि! कि मोर करम अभाग
आमार समान हीन नाहि ए सोंसारे
आमि अति दिन-मति ब्रज-कुञ्जे निबसति
आमि अति पामर दुर्जन
ओरे मन कर्मेर कुहरे गेलो काल
ओरे मन कि बिपद होइलो आमार
ओरे मन क्लेश-ताप देखि जे अशेष
ओरे मन बारिबार आशा केनो कोरो
ओरे मन भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा कोरो दूर
गोराचन्देर अज्ञ पेये गृह-बासि-गण
जौवने जखोन, धन-उपार्जने,
ष्री-कृष्ण तव कारुण्य
धन जन देह गेह कृष्णे समर्पण
पूर्ण-चिद्-आनन्द तुमि तोमार चित्-कण आमि
प्रदोष-समये श्रीबास-अङ्गने
प्रबेशिया अन्तः-पुरे नारी-गणे शान्त कोरे
(प्रभु हे!) शुनो मोर् दुःखेर् काहिनी
प्रभुर बचन तखन शुनिया
बान्धिलो माया जे दिन हो'ते
बिषय-बासना-रूप चित्तेर बिकार
भबार्णबे पो'डे मोरे आकुल पराण
मृत शिशु लो'ये तबे भकत-बत्सल
शरीरेर सुखे मन देहो जलञ्जलि
श्रीबास-बचन श्रबण कोरिया
श्रीबासे कोहेन प्रभु तुँहु मोर दास
श्रीबासेर प्रति चैतन्य-प्रसाद
सबु मेलि' बालक-भाग बिचारि'
साधु-सङ्ग ना होइलो हाय
हरि हरि! कि मोर करम गति मन्द
हरि हरि! कृपा करि राख निज-पदे
हरि हरि! बिफले जनम गोञाइनु