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प्रथम स्रि कुन्जविहर्यस्तकम्

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AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित

इन्द्रनिल-मनि-मस्जुल-वर्नह् फुल्ल-निप-कुसुमस्चित-कर्नह् क्र्स्नलभिर् अक्र्सोरसि हरि सुन्दरो जयति कुस्ज-विहरि
अर्थ

इन्द्रनील मणि-सी मनोहर वर्ण वाले, कानों में खिले कदंब के फूलों से सुसज्जित, गुंजा-मालाओं से सुशोभित आकर्षक वक्षस्थल वाले, सुंदर हरि, कुंज-विहारी की जय हो!

रधिक-वदन-चन्द्र-चकोरह् सर्व-बल्लव-वधु-ध्र्ति-चौरह् चर्चरि-चतुरतस्चित-चरि चरुतो जयति कुस्ज-विहरि
अर्थ

जो राधिका के मुख-चंद्र के प्रति चकोर हैं, समस्त गोपियों के धैर्य के चोर हैं, हास-परिहास में चतुर, कुशल क्रीड़ाओं में निपुण, मनोहर कुंज-विहारी की जय हो!

सर्वतह् प्रथित-कौलिक-पर्व ध्वम्सनेन ह्र्त-वसव-गर्वह् गोस्थ-रक्सन-क्र्ते गिरिधरि लिलय जयति कुस्ज-विहरि
अर्थ

जिन्होंने सर्वत्र प्रसिद्ध पुरातन पर्व को उलटकर इन्द्र के गर्व को हर लिया; जो गोकुल की रक्षा के लिए पर्वतधारी बने, लीलापूर्वक कुंज-विहारी की जय हो!

रग-मन्दल-विभुसित-वम्सि विभ्रमेन मदनोत्सव-सम्सि स्तुयमन-चरितह् सुक-सरि स्रेनिभिर् जयति कुस्ज-विहरि
अर्थ

वलयाकार धुनों से सुसज्जित बाँसुरी की मनोहर क्रीड़ा से, कामदेव के उत्सव की घोषणा करते हुए, जिनकी लीलाओं की स्तुति तोतों और मैनाओं के झुंड करते हैं, कुंज-विहारी की जय हो!

सतकुम्भ-रुचि-हरि-दुकुलह् केकि-चन्द्रक-विरजित-चुलह् नव्य-यौवन-लसद्-व्रज-नरि रस्जनो जयति कुस्ज-विहरि
अर्थ

स्वर्ण की आभा को भी मात देने वाले वस्त्र पहने, मोरपंख की आँख से सुसज्जित केशगुच्छ वाले, व्रज की नवयौवना, देदीप्यमान स्त्रियों को आनंदित करने वाले, कुंज-विहारी की जय हो!

स्थसकि-क्र्त-सुगन्धि-पतिरह् स्वर्न-कस्चि-परिसोभि-कतिरह् रधिकोन्नत-पयोधर-वरि कुस्जरो जयति कुस्ज-विहरि
अर्थ

अपनी देह को कस्तूरी-लेप से सुगंधित किए, कमर को स्वर्ण-करधनी से सुशोभित किए, जो राधिका के उन्नत, कलश-सी वक्ष-संपदा के बीच हाथी-सा क्रीड़ा करते हैं, कुंज-विहारी की जय हो!

गौर-धतु-तिलकोज्ज्वल-भलह् केलि-चस्चलित-चम्पक-मलह् अद्रि-कन्दर-ग्र्हेस्व् अभिसरि सुभ्रुवम् जयति कुस्ज-विहरि
अर्थ

जिनका मस्तक गौर खनिज-तिलक से देदीप्यमान है, जिनकी चंपक-माला क्रीड़ा में डोलती रहती है, जो सुंदर भ्रू वाली गोपियों से मिलने पर्वत की गुफा-गृहों में अभिसार करने जाते हैं, कुंज-विहारी की जय हो!

विभ्रमोच्चल-द्र्ग्-अस्चल-न्र्त्य क्सिप्त-गोप-ललनखिल-क्र्त्यह् प्रेम-मत्त-व्र्सभनु-कुमरि नगरो जयति कुस्ज-विहरि
अर्थ

अपनी चंचल, नाचती, खिलंदड़ी दृष्टि से जो गोपियों को उनके सारे कर्तव्य भुला देते हैं; जो वृषभानु-कन्या के प्रेमोन्मत्त प्रियतम हैं, कुंज-विहारी की जय हो!

अस्तकम् मधुर-कुस्ज-विहरि क्रिदय पथति यह् किल हरि स प्रयति विलसत्-पर-भगम् तस्य पद-कमलर्चन-रगम्
अर्थ

जो भी हरि के इस मधुर कुंज-विहार लीला के इस अष्टक का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, वह परम देदीप्यमान गंतव्य को प्राप्त करता है और उनके चरणकमलों की भक्तिपूर्ण उपासना का अनुराग पाता है।