सहचर अङ्गे गोरा अङ्ग हेल इया
किसी साथी के अंग का सहारा लेकर श्री गौर चल नहीं सकते। अगले ही क्षण वे मूर्च्छित हो जाते हैं।
वे अत्यन्त दुर्बल हैं। वे चल नहीं सकते। अगले ही क्षण वे भूमि पर गिर पड़ते हैं। उनके साथी उनके मुख की ओर देखते रहते हैं।
अगले ही क्षण "मेरे प्राणनाथ कहाँ हैं?" कहकर वे रो पड़ते हैं। विरह की ज्वाला उनके भीतर जलती है। उन्हें शान्ति नहीं मिलती।
श्री गौर ऐसे क्यों हो गए हैं? मुझे नहीं पता। ज्ञान दास कहते हैं, इन लीलाओं को देखकर मैं अभिभूत हो जाता हूँ।