“जय राधा माधव” के परिणाम
536 भजन · 902 पद भजन के शब्दों में · 608 पद अर्थ में
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- पद 4भजननाना बाद्य-ध्वनि भेदये गगन
नाचे नर्तक कि मधुर गति
जय जय रबे भरये भुबन
भणे घनश्याम कौतुक अति - पद 4अर्थअनेक वाद्य-यंत्र ऐसा तुमुल संगीत बजाते हैं जो आकाश को भेद देता है। नर्तकगण नृत्य करते हैं। उनकी गतियाँ कितनी मधुर हैं! सारा संसार "जय! जय!" की ध्वनि से भर जाता है। आनंदित घनश्याम दास ये वचन कहते हैं।
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- पद 2भजनरूप पिबा-इते मत्त अतिशय, करत भूसुर-बृन्द जय जय
बन्दी-गण-मन-मोदित घन घन बिमल यश परकाशये
तेजि निज निज गेह धायत, नारी-पुरुख नमेह पायत
निरखि रहु चहु ओर निमिखन-दरश-रस-सुखे भासये - पद 2अर्थउनके सुंदर रूप के दर्शन का अमृत पीकर ब्राह्मण आनंद से मतवाले हो जाते हैं। वे जय! जय! पुकारते हैं। आनंदित मन से बन्दीजन (स्तुति गाने वाले) प्रभु का निर्मल यश बार-बार गाते हैं। स्त्री-पुरुष अपने घर छोड़कर दौड़ पड़ते हैं। वे निताई प्रभु के चरणों में प्रणाम करते…
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- पद 4भजनपुष्प-बरिषण करे सुर-गण
अलखित रीति उपमा नहु
जय जय ध्वनि भरल अबनी
भणे घनश्याम मङ्गल बहु - पद 4अर्थदेवताओं ने फूलों की वर्षा की। शिशु अद्वैतचन्द्र की महिमा जैसी महिमा किसी ने कभी नहीं देखी। उनकी महिमा का कोई सानी नहीं है। सारा जगत "जय! जय!" की ध्वनि से भर गया। घनश्याम दास इन शुभ लीलाओं का वर्णन करते हैं।
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- पद 1भजनअङ्ग-श्यामलिम-छटाभिर् अभितो मन्दी-कृतेन्दीवरं
जाड्यं जागुड-रोचिषां विदधतं पट्टाम्बरस्य श्रिया
वृन्दारण्य-विलासिनं हृदि लसद्-दामाभिर् आमोदरं
राधा-स्कन्ध-निवेशितोज्ज्वल-भुजं ध्यायेम दामोदरम् - पद 1अर्थ…उनके वक्ष पर झूलती माला उन्हें सजाती और सुगन्धित करती है, और उन्होंने अपनी उज्ज्वल भुजा राधा के कन्धे पर रखी है।…
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- पद 1भजन…शर-पाश-रुद्ध-सुतजानिरुद्ध-परिमोक्ष-दक्ष सुखित-स्व-पक्ष
स-वधूकम् एवम् अनिरुद्ध-देवम् उपनीय गेहम् अति-मानुषेह
पुनर् आत्म-गोष्ठम् इत वेणुकोष्ठ परिपूर्य सर्वम् अकृथ स-पर्व
जय गोप-राज-कुलजाधिराज. वीर. - पद 1अर्थ…में लौट आए और सबको उत्सव से भर दिया। हे वीर, हे गोपराज के कुल में जन्मे राजाधिराज, आपकी जय हो!…
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- पद 3भजनए सब् ना छेडे' किसे पा'बे राधा-कृष्ण
(जतने छाडो, छाडो हे)
साधु-सङ्ग विना आर् कोथा तव इष्ट
(साधु-सङ्ग कोरो, कोरो हे) … - पद 3अर्थइन सबको त्यागे बिना तू राधा-कृष्ण को कैसे पाएगा? बड़ी सावधानी से इन्हें त्याग दे, त्याग दे। साधु-संग के बिना तेरा वास्तविक कल्याण और कहाँ है? साधु-संग कर, कर। वैष्णवों के चरणों में लीन हो जा, तेरा सारा अनिष्ट दूर हो जाएगा। एक बार सोचकर तो देख।
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- पद 4भजनगोष्ठ-जनाभय-सत्त्र-महा-व्रत-दीक्षित भवतो माधव बाला
कथम् अर्हति तां हन्त सनातन विषम-दशां गुण-वृन्द-विशाला - पद 4अर्थहे माधव, तुम जो गोकुलवासियों को निर्भयता प्रदान करने वाले उस महायज्ञ के व्रत में दीक्षित हो, हाय, हे सनातन, इतने गुणों से भरी यह बालिका ऐसी भयंकर दशा भोगने की भला कैसे पात्र हो सकती है?