- पद 3भजनए सब न छेडे किसे पा'बे राधा कृष्ण
(जतने छाडो छाडो हे)
साधु-सङ्ग बिना आर कोथा तब इष्ट
(साधु-सङ्ग कोरो कोरो हे) … - पद 3अर्थयदि तुम इन सबको नहीं छोड़ोगे, तो श्री श्री राधा कृष्ण को कैसे प्राप्त करोगे? (प्रयत्न करके इन्हें छोड़ो! छोड़ो!) साधु-संग के बिना तुम अपना अभीष्ट कैसे प्राप्त करोगे? (साधु-संग करो! साधु-संग करो!) वैष्णवों के चरणों में डूब जाओ। तब तुम्हारे सारे अनिष्ट मिट…
“हरे कृष्ण” के परिणाम
558 भजन · 980 पद भजन के शब्दों में · 802 पद अर्थ में
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- पद 5भजनअकैतब कृष्ण-प्रेम जेन सु-बिमल हेम
सेइ फल नृ-लोके दुर्लभ
कैतबे बाञ्चन-मात्र हओ आगे जोग्य-पात्र
तबे प्रेम होइबे सुलभ - पद 5अर्थसच्चा कृष्ण-प्रेम शुद्ध स्वर्ण के समान है, यह फल मनुष्य-लोक में अत्यन्त दुर्लभ है। जो तू कर रहा है, वह तो मात्र छलावा है। पहले उस प्रेम के योग्य पात्र बन, तब वह प्रेम तुझे सहज ही प्राप्त हो जाएगा।
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- पद 3भजनबर्णाश्रम-धर्म यजि' नाना देब-देबी भजि'
मद-गर्बे काटाइनु जीबन
स्थीर ना होइलो मन ना लभिनु शान्ति-धन
न भजिनु श्री-कृष्ण-चरण - पद 3अर्थवर्णाश्रम धर्म का पालन करके, अनेक देवी देवताओं की पूजा करके, मैंने अपना जीवन मद और अहंकार में बिता दिया। फिर भी मन को शांति नहीं मिली, मैंने शांति रूपी धन नहीं पाया, मैंने श्री कृष्ण के चरणों की भक्ति नहीं की।
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- पद 4भजनमाया-दत्त कु-बिकार मायाबाद बिष-भार
ए दुइ आपद निबरण
हरि-नामामृत-पान साधु बैद्य सु-बिधान
श्री-कृष्ण-चैतन्य-श्री-चरण - पद 4अर्थमाया से उत्पन्न रोग, और मायावाद का विषभार, इन दोनों आपदाओं की एक ही औषधि है, हरिनाम का अमृत पान। और इस औषधि को देने वाला सुयोग्य वैद्य वह साधु है जो श्री कृष्ण चैतन्य के श्री चरणों की शरण में रहता है।
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- पद 3भजन…जीबे लो'ये कोरे' टानाटानि
देखो देखो भोयङ्कर जीबेर दुर्गति
जीब चाइ कृष्ण भजि देहो जोडे जाय मजि'
शेषे जीब पसरे आपनि - पद 3अर्थ…इधर उधर खींचती रहती हैं। देखो, देखो, जीव की यह दशा कितनी भयानक और दुर्भाग्यपूर्ण है! जीव कृष्ण की भक्ति करना चाहता है, परंतु शरीर माया में डूबा रहने के कारण, अंत में जीव अपने आप को ही भूल जाता है।…
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- पद 2भजन…नित्य-धर्म अनुस्यूत अद्वितीय प्रभु
आस्वादक कृष्ण-रूप आस्वाद्य राधिका
द्वैतानन्द परानन्द-पीठ बृन्दाबन
प्राकृत जगते जा'र प्रोकाश बिशेष … - पद 2अर्थ…और आस्वाद्य का भेद है। यही उस अद्वितीय प्रभु का नित्य स्वभाव है। आस्वादक रूप में वे कृष्ण हैं, और आस्वाद्य रूप में राधिका हैं। इस द्वैत में कैसा आनंद है! उनका परम आनंद-धाम वृन्दावन है, जिसे योगमाया इस भौतिक जगत में भी विशेष रूप से प्रकट करती है। उसी की शरण…
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