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“हरे कृष्ण” के परिणाम

558 भजन · 980 पद भजन के शब्दों में · 802 पद अर्थ में

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भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 3भजन
    ए सब न छेडे किसे पा'बे राधा कृष्ण
    (जतने छाडो छाडो हे)
    साधु-सङ्ग बिना आर कोथा तब इष्ट
    (साधु-सङ्ग कोरो कोरो हे) …
  • पद 3अर्थ
    यदि तुम इन सबको नहीं छोड़ोगे, तो श्री श्री राधा कृष्ण को कैसे प्राप्त करोगे? (प्रयत्न करके इन्हें छोड़ो! छोड़ो!) साधु-संग के बिना तुम अपना अभीष्ट कैसे प्राप्त करोगे? (साधु-संग करो! साधु-संग करो!) वैष्णवों के चरणों में डूब जाओ। तब तुम्हारे सारे अनिष्ट मिट…
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भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 2भजन
    बृन्दाबन-चिन्तामणि चिद्-आनन्द-रत्न-खनि
    चिन्मोय अपूर्ब-दरशन
    तहि माझे चमत्कार कृष्ण-बनस्पति-सार
    नीलमणि तमाल जेमोन
  • पद 7अर्थ
    भक्तिविनोद उन दोनों (राधा-कृष्ण) के मिलन की ही कामना करते हैं। इसके अतिरिक्त वे कभी कुछ और नहीं चाहते।
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भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    राधा-भजने जदि मति नाहि भेला
    कृष्ण-भजन तब अकारण गेला
  • पद 1अर्थ
    यदि तुम्हारा मन श्री राधा की भक्ति में नहीं लगता, तो तुम्हारी कृष्ण-भक्ति व्यर्थ चली जाती है।
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भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 6भजन
    राधा कृष्ण प्राण मोर जीबने मरणे
    मोरे राखि' मारि' सुखे थाकुक दु' जने
  • पद 6अर्थ
    राधा-कृष्ण ही मेरे प्राण हैं, जीवन में भी और मृत्यु में भी। वे मुझे रखें या मार डालें, मैं यही प्रार्थना करती हूँ कि वे दोनों सदा सुखी रहें।
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भक्तिविनोद ठाकुर · शरणागति

  • पद 7भजन
    गाथबि माला मनोहारिणी
    निति राधा-कृष्ण-विमोहिनी
  • पद 7अर्थ
    प्रतिदिन ऐसी मनोहर मालाएँ गूँथना, जो राधा-कृष्ण को सदा मोहित कर लें।
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भक्तिविनोद ठाकुर · शरणागति

  • पद 7भजन
    धिक् ता’र कृष्ण-सेवा-श्रवन-कीर्तन्
    कृष्ण-अङ्गे वज्र हाने ताहार स्तवन्
  • पद 7अर्थ
    उनकी कृष्ण-सेवा, श्रवण और कीर्तन के दिखावे पर धिक्कार है! उनकी स्तुतियाँ कृष्ण के दिव्य शरीर पर वज्र बनकर गिरती हैं।
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भक्तिविनोद ठाकुर · शरणागति

  • पद 1भजन
    …तोमारे भुलिया, अविद्या-पीडाय,
    पीडित रसना मोर
    कृष्ण-नाम-सुधा, भालो नाहि लागे,
    विषय-सुखते भोर
  • पद 1अर्थ
    हे हरि! तुझे भूलकर मेरी जिह्वा अविद्या रूपी पीलिया से पीड़ित हो गई है। सांसारिक सुखों में डूबी इस जिह्वा को कृष्ण-नाम का अमृत अच्छा नहीं लगता।
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भक्तिविनोद ठाकुर · शरणागति

  • पद 2भजन
    कृष्ण-नाम-रूप- गुन-सुचरित,
    परम जतने कोरि’
    रसना-मानसे, कोरहो नियोग,
    क्रम-विधि अनुसरि’
  • पद 2अर्थ
    'बड़े यत्न से, क्रम-विधि का पालन करते हुए, अपनी जिह्वा और मन को कृष्ण के नाम, रूप, गुण और लीलाओं के कीर्तन और स्मरण में लगा।'
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भक्तिविनोद ठाकुर · शरणागति

  • पद 2भजन
    श्री-राधार सुखे, कृष्णएर ये सुख,
    जानिबो मनेते आमि
    राधा-पद छाडि’, श्री-कृष्ण-सङ्गमे,
    कभु ना होइबो कामी
  • पद 2अर्थ
    श्री राधा के सुख में ही जो कृष्ण का सुख है, उसे मैं अपने हृदय में जानूँगी। राधा के चरण छोड़कर मैं कभी श्री कृष्ण के सीधे संगम की कामना नहीं करूँगी।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 1भजन
    दीक्षा-गुरु कृपा कोरि' मन्त्र-उपदेश
    कोरिया देखान कृष्ण-तत्त्वेर निर्देश
  • पद 1अर्थ
    दीक्षा-गुरु कृपापूर्वक मंत्र की शिक्षा देते हैं। इस प्रकार वे कृष्ण-तत्व का मार्गदर्शन करते हैं।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 5भजन
    बिनोद कोहिछे मन राधा-कृष्ण-श्री-चरण
    भजो भजो भजो निरन्तर
  • पद 5अर्थ
    हे मन! भक्तिविनोद तुझसे यह कहते हैं, सदा राधा-कृष्ण के श्री चरणों की उपासना कर, उपासना कर, उपासना कर।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 5भजन
    बिनोदेर ए मिनति छारि' अन्य-जोग-गति
    कोरो' राधा-कृष्ण-अराधान
  • पद 5अर्थ
    यह भक्तिविनोद की विनती है: अन्य सभी योग-मार्गों को त्यागकर, राधा-कृष्ण की आराधना कर।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 4भजन
    जदि थाके बहु धन निजे हो'बे अकिञ्चन
    बैष्णबेर कोरो उपकार
    जीबे दोया अनुखण राधा-कृष्ण-अराधन
    कोरो सदा हो'ये सदाचार
  • पद 4अर्थ
    यदि तेरे पास बहुत धन है, तो उसे अपने लिए मत रख, स्वयं अकिंचन बनकर वैष्णवों की सेवा में लगा दे। सब जीवों पर निरन्तर दया कर, सदा राधा-कृष्ण की आराधना कर, और सदाचारी बनकर रह।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 5भजन
    अकैतब कृष्ण-प्रेम जेन सु-बिमल हेम
    सेइ फल नृ-लोके दुर्लभ
    कैतबे बाञ्चन-मात्र हओ आगे जोग्य-पात्र
    तबे प्रेम होइबे सुलभ
  • पद 5अर्थ
    सच्चा कृष्ण-प्रेम शुद्ध स्वर्ण के समान है, यह फल मनुष्य-लोक में अत्यन्त दुर्लभ है। जो तू कर रहा है, वह तो मात्र छलावा है। पहले उस प्रेम के योग्य पात्र बन, तब वह प्रेम तुझे सहज ही प्राप्त हो जाएगा।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 2भजन
    सुबर्ण कोरिया त्याग तुच्छ लोष्ट्रे अनुराग
    दुर्भगर एइ तो' लखण
    कृष्णेतर सङ्ग कोरि' साधु-जने परिहोरि'
    मद-गर्बे काटानु जीबन
  • पद 2अर्थ
    सोना छोड़कर मैंने मिट्टी के ढेले से प्रेम किया, यही मेरा दुर्भाग्य है। कृष्ण से रहित लोगों का संग करके, साधुजनों को त्यागकर, मैंने अपना जीवन मद और अहंकार में बिता दिया।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 3भजन
    बर्णाश्रम-धर्म यजि' नाना देब-देबी भजि'
    मद-गर्बे काटाइनु जीबन
    स्थीर ना होइलो मन ना लभिनु शान्ति-धन
    न भजिनु श्री-कृष्ण-चरण
  • पद 3अर्थ
    वर्णाश्रम धर्म का पालन करके, अनेक देवी देवताओं की पूजा करके, मैंने अपना जीवन मद और अहंकार में बिता दिया। फिर भी मन को शांति नहीं मिली, मैंने शांति रूपी धन नहीं पाया, मैंने श्री कृष्ण के चरणों की भक्ति नहीं की।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 4भजन
    माया-दत्त कु-बिकार मायाबाद बिष-भार
    ए दुइ आपद निबरण
    हरि-नामामृत-पान साधु बैद्य सु-बिधान
    श्री-कृष्ण-चैतन्य-श्री-चरण
  • पद 4अर्थ
    माया से उत्पन्न रोग, और मायावाद का विषभार, इन दोनों आपदाओं की एक ही औषधि है, हरिनाम का अमृत पान। और इस औषधि को देने वाला सुयोग्य वैद्य वह साधु है जो श्री कृष्ण चैतन्य के श्री चरणों की शरण में रहता है।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 3भजन
    …जीबे लो'ये कोरे' टानाटानि
    देखो देखो भोयङ्कर जीबेर दुर्गति
    जीब चाइ कृष्ण भजि देहो जोडे जाय मजि'
    शेषे जीब पसरे आपनि
  • पद 3अर्थ
    …इधर उधर खींचती रहती हैं। देखो, देखो, जीव की यह दशा कितनी भयानक और दुर्भाग्यपूर्ण है! जीव कृष्ण की भक्ति करना चाहता है, परंतु शरीर माया में डूबा रहने के कारण, अंत में जीव अपने आप को ही भूल जाता है।…
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 2भजन
    …नित्य-धर्म अनुस्यूत अद्वितीय प्रभु
    आस्वादक कृष्ण-रूप आस्वाद्य राधिका
    द्वैतानन्द परानन्द-पीठ बृन्दाबन
    प्राकृत जगते जा'र प्रोकाश बिशेष …
  • पद 2अर्थ
    …और आस्वाद्य का भेद है। यही उस अद्वितीय प्रभु का नित्य स्वभाव है। आस्वादक रूप में वे कृष्ण हैं, और आस्वाद्य रूप में राधिका हैं। इस द्वैत में कैसा आनंद है! उनका परम आनंद-धाम वृन्दावन है, जिसे योगमाया इस भौतिक जगत में भी विशेष रूप से प्रकट करती है। उसी की शरण…
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 8भजन
    तुमि नित्यानन्द-शक्ति कृष्ण-भक्ति-गुरु
    ए दासे कोरोहो दान पद-कल्प-तरु
  • पद 8अर्थ
    तुम श्री नित्यानन्द प्रभु की शक्ति हो, तुम कृष्ण भक्ति की गुरु हो। इस दास को अपने चरण रूपी कल्पवृक्ष का दान दो।