ना कोरोलुँ करम
ना कोरोलुँ करम, गेयान नाहि भेलो,
शरणागति में 50 भजन हैं, जिनके रचयिता भक्तिविनोद ठाकुर हैं, जो 11 अध्यायों में सजे हैं।
50 भजन
ना कोरोलुँ करम, गेयान नाहि भेलो,
(प्रानेश्वर्!) कोहोबुँ कि सरम कि बात्
मानस, देहो, गेहो, जो किछु मोर्
`अहं मम’-शब्द-अर्थे जाहा किछु होय्
`आमार’ बोलिते प्रभु! आरे किछु नाइ
बस्तुतः सकलि तव, जीव केहो नोय्
निवेदन कोरि प्रभु! तोमार चरणे
आत्म-निवेदन, तुवा पदे कोरि’,
भुलिया तोमारे, संसारे आसिया,
विद्यार विलासे, काटाइनु काल,
जौवने जखोन, धन-उपार्जने,
आमार जीवन, सदा पापे रत,
(प्रभु हे!) शुनो मोर् दुःखेर् काहिनी
(प्रभु हे!) तुवा पदे ए मिनति मोर्
(प्रभु हे!)
कबे गौर-बने, सुरधुनी-तटे,
देखिते देखिते भुलिबो बा कबे
बृषभानु-सुता- चरण-सेवने,
एखोन बुझिनु प्रभु! तोमार चरण
तुमि तो’ मारिबे जारे, के तारे राखिते पारे,
आत्म-समर्पने गेला अभिमान्
छोडतो पुरुष-अभिमान्
हरि हे!
हरि हे!
हरि हे!
हरि हे!
हरि हे!
हरि हे!
ओहे!
हरि हे!
हरि हे!
गुरुदेव्!
गुरुदेव्!
गुरुदेव्!
गुरुदेव्!
कबे ह'बे बोलो से-दिन आमार्
केशव! तुवा जगत विचित्र
तुवा-भक्ति-प्रतिकूल धर्म जा’ते रोय्
विषय-विमूढ आर् मायावादी जन्
आमि तो’ स्वानन्द-सुखद-बासी
कि जानि कि बले, तोमार धामेते,
दारा-पुत्र-निज-देहो-कुटुम्ब-पालने
सर्वस्व तोमार्, चरणे संपिया,
तुमि सर्वेश्वरेश्वर, ब्रजेन्द्र-कुमार!
कृष्ण-नाम धरे कोतो बल्
तुवा-भक्ति-अनुकूल जे-जे कार्य होय्
गोद्रुम-धामे भजन-अनुकूले
शुद्ध-भकत-चरण-रेणु,
राधा-कुन्ड-तट-कुञ्ज-कुटीर्
श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु जीवे दोया कोरि’