सोणार बरण गौर सुन्दर
श्री गौरसुन्दर का सुनहरा शरीर सफेद और फीका पड़ गया है। क्या ठण्ड से या डर से वे इतना काँप रहे हैं? वे अपने प्रिय के ध्यान में मग्न हैं।
वे एक शब्द भी नहीं बोलते। वे लम्बी-लम्बी साँसें भरते हैं। स्तब्ध होकर वे किसी अचल चित्रित पुतले के समान दिखते हैं। उनकी आँखों से आँसू बहते हैं, जैसे आकाश-गंगा की धार।
उनका सारा शरीर पसीने से भीग जाता है। उन्हें ऐसा ज्वर कैसे चढ़ गया? कभी वे गाते हैं, कभी रोते हैं, कभी कटु विलाप करते हैं।
नरहरि कहते हैं, मेरे प्रभु गौर-हरि अभिभूत हैं। दोनों बाहें उठाकर वे "हरि! हरि!" का जाप करते हैं। उनके हृदय की बात कौन समझ सकता है?