सोणार बरण गोरा प्रेम बिनोदिया
सुनहरे रंग के गौर प्रभु प्रेम की लीलाओं का आनन्द लेते हैं। वे नदिया के नगरों को प्रेम की बाढ़ में तैरा देते हैं।
प्रेम के अश्रु उनके वक्षस्थल पर बहते रहते हैं। प्रेमानन्द में उन्मत्त होकर उन्हें यह भी ज्ञान नहीं रहता कि दिन है या रात्रि।
वे सहारे के लिए गोविन्द पर झुक जाते हैं। वे वृन्दावन की महिमा सुनने में डूब जाते हैं।
"राधा! राधा!" कहते हुए वे मूर्च्छित हो जाते हैं। शिवानन्द रोते हैं। प्रभु के इन भावों को शिवानन्द तनिक भी नहीं समझ पाते।