स्रस्तम् स्रस्तम् उदनिचयन्त्य्
AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित
बार-बार अपने ढीले, निर्बल हाथ से सरकते हुए गहरे नीले वस्त्र के छोर को ऊपर खींचते हुए, अपने शरीर पर बिखरे हुए सारे आभूषण लिए, आधी खुली वेणी को फिर से बाँधते हुए, थकी-मंद दृष्टि से नेत्र घुमाते हुए, देखो हे सखी, राधिका कुंज से घर में प्रवेश कर अब चुपचाप लेट गई हैं।
मुरझाई माला को उतार फेंकते हुए, मोतियों की माला टूटी हुई, अधरों पर काजल फैला हुआ, उनके अंगों पर सर्वत्र नाखूनों के निशान, उनके कमल-नयन घूमते हुए हर दिशा में दृष्टि डालते, देखो, थकी और शिथिल देह लिए, ग्वालों की सभा में अनजाने ही प्रवेश करते हुए, गोप-राज का पुत्र रात्रि के अंत होते ही गोकुल में प्रवेश करता है।