Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

श्री गोविन्दाष्टक

श्री गोविन्दाष्टक चिद्-आनन्दाकारं श्रुति-सरस-सारं सम-रसं निराधाराधारं भव-जलधि-पारं पर-गुणम् रमा-ग्रीवा-हारम् व्रज-वन-विहारं हर-नुतं सदा तं गोविन्दं परम-सुख-कन्दं भजत रे
अर्थ

उनका रूप चिन्मय आनन्द से भरा है। वे वेदों का मधुर सार हैं। वे अमृत के समान मधुर हैं। वे परम स्वतन्त्र हैं। वे ऐसे आधार हैं जिन पर सब कुछ टिका है। वे भक्तों को जन्म-मृत्यु के सागर के उस पार पहुँचाते हैं। वे परम गुणवान् हैं। वे देवी लक्ष्मी के गले का हार हैं। वे व्रज के वनों में लीलाएँ करते हैं। शिव उनकी महिमा का गान करते हैं। हे लोगो, परम आनन्द के मूल उन भगवान् गोविन्द का सदा भजन करो।

महाम्भोधि-स्थानं स्थिर-चर-निदानं दिविज-पं सुधा-धारा-पानं विहग-प्रतियानं यम-रतम् मनो-ज्ञं सु-ज्ञानम् मुनि-जन-निधानं ध्रुव-पदं सदा तं गोविन्दं परम-सुख-कन्दं भजत रे
अर्थ

वे महासागर में निवास करते हैं। वे समस्त चर-अचर प्राणियों के पिता हैं। वे ऊपर के लोकों में देवताओं की रक्षा करते हैं। वे अमृत की धारा हैं। वे गरुड़ पर सवार होते हैं। वे भक्ति से प्रसन्न होते हैं। वे हर हृदय को जानते हैं। वे सब कुछ जानते हैं। वे मुनियों के आश्रय हैं। ध्रुव को उन्होंने शाश्वत धाम दिया। हे लोगो, परम आनन्द के मूल उन भगवान् गोविन्द का सदा भजन करो।

धिया धीरैर् ध्येयं श्रवण-पुट-पेयं यति-वरैर् महा-वाक्यैर् ज्ञेयं त्रि-भुवन-विधेयं विधि-परम् मनो-मानामेयं सपदि हृदि नेयं नव-तनुं सदा तं गोविन्दं परम-सुख-कन्दं भजत रे
अर्थ

अपनी बुद्धि को उन पर स्थिर करके धीर मुनि उनका ध्यान करते हैं। अपने कानों के प्यालों को भरकर तपस्वी उनकी महिमा का अमृत पीते हैं। वेदों के महावाक्यों से वे जाने जाते हैं। उन्होंने तीनों लोकों की रचना की। जो कुछ होना है, उसके वे परम विधाता हैं। भौतिक मन में उन्हें नापने की सामर्थ्य नहीं है। एक क्षण में वे अपने भक्त के हृदय में अपना नवयौवन रूप प्रकट कर देते हैं। हे लोगो, परम आनन्द के मूल उन भगवान् गोविन्द का सदा भजन करो।

महा-माया-जालं विमल-वन-मालं मल-हरं सु-भालं गोपालं निहत-शिशुपालं शशि-मुखम् कलातीतं कालं गति-हय-मरालं मुर-रिपुं सदा तं गोविन्दं परम-सुख-कन्दं भजत रे
अर्थ

उनकी आज्ञा से देवी महामाया अपना जाल बुनती हैं। वे वन के फूलों की सुन्दर माला पहनते हैं। वे सब पापों को हर लेते हैं। उनका मस्तक सुन्दर है। वे ग्वाल-बालक गोपाल हैं। उन्होंने शिशुपाल का वध किया। उनका मुख चन्द्रमा के समान है। वे काल के स्पर्श से परे हैं। वे स्वयं काल हैं। उनकी चाल सुन्दर हंस के समान है। वे मुर दैत्य के शत्रु हैं। हे लोगो, परम आनन्द के मूल उन भगवान् गोविन्द का सदा भजन करो।

नभो-बिम्ब-स्फीटं निगम-गुण-गीतं सम-गतिं सुरौघे सम्प्रीतं दितिज-विपरीतं पुरि-शयम् गिरा पन्थातीतं स्वदित-नवनीतं नय-करं सदा तं गोविन्दं परम-सुख-कन्दं भजत रे
अर्थ

वे आकाश में चमकते पूर्ण चन्द्रमा के समान तेजस्वी हैं। वेद उनके गुणों का गान करते हैं। वे सबके प्रति समान हैं। वे देवताओं से प्रसन्न रहते हैं। असुरों से वे प्रसन्न नहीं होते। वे द्वारका-पुरी में निवास करते हैं। वे भौतिक वाणी के मार्ग से परे हैं। वे ताज़ा मक्खन का स्वाद लेते हैं। वे सबके मार्गदर्शक हैं। हे लोगो, परम आनन्द के मूल उन भगवान् गोविन्द का सदा भजन करो।

परेशं पद्मेशं शिव-कमलजेशं शिव-करं द्विजेशं देवेशं तनु-कुटिल-केशं कलि-हरं खगेशं विश्वेशं निखिल-भुवनेशं जग-धरं सदा तं गोविन्दं परम-सुख-कन्दं भजत रे
अर्थ

वे परम नियन्ता हैं। वे देवी लक्ष्मी के स्वामी हैं। वे शिव और ब्रह्मा के स्वामी हैं। वे कल्याण करने वाले हैं। वे ब्राह्मणों के स्वामी हैं। वे देवताओं के स्वामी हैं। उनके केश महीन और घुँघराले हैं। वे कलह को रोकते हैं। वे गरुड़ के स्वामी हैं। वे ब्रह्माण्डों के स्वामी हैं। वे सब लोकों के स्वामी हैं। वे ब्रह्माण्डों का पालन करते हैं। हे लोगो, परम आनन्द के मूल उन भगवान् गोविन्द का सदा भजन करो।

रमा-कान्तं कान्तं भव-भय-भयान्तं भव-सखं दुराशान्तं शान्तं निखिल-हृदि भ्रान्तं भुवन-पम् निवादान्तं दान्तं दनुज-निचयान्तं सु-चरितं सदा तं गोविन्दं परम-सुख-कन्दं भजत रे
अर्थ

वे देवी लक्ष्मी के प्रियतम हैं। वे सुन्दर हैं। वे जन्म-मृत्यु के इस संसार का समस्त भय समाप्त करते हैं। वे इस संसार में एकमात्र मित्र हैं। वे सब पापमय इच्छाओं का अन्त कर देते हैं। वे परम शान्त हैं। वे प्रत्येक हृदय में निवास करते हैं। वे लोकों की रक्षा करते हैं। वे सब वाद-विवाद का अन्त कर देते हैं। वे संयमी हैं। वे दानवों के समूह का अन्त करते हैं। उनके कर्म महिमामय हैं। हे लोगो, परम आनन्द के मूल उन भगवान् गोविन्द का सदा भजन करो।

जगज्-ज्येष्ठं श्रेष्ठं सुरपति-कनिष्ठं क्रतु-पतिम् बलिष्ठं भूयिष्ठं त्रिभुवन-वरिष्ठं वर-वहम् स्व-निष्ठं धर्मिष्ठं गुरु-गण-गरिष्ठं गुरु-वरं सदा तं गोविन्दं परम-सुख-कन्दं भजत रे
अर्थ

वे सब लोकों में श्रेष्ठ हैं। वे सबसे महान हैं। वे इन्द्र के छोटे भाई उपेन्द्र हैं। वे सब यज्ञों के स्वामी हैं। वे सबसे बलवान हैं। वे सर्वोत्तम हैं। वे तीनों लोकों में सबसे पूजनीय हैं। वे वर देने वाले हैं। वे स्वतन्त्र हैं। वे धर्मनिष्ठ हैं। वे सब गुरुओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। वे परम स्वामी हैं। हे लोगो, परम आनन्द के मूल उन भगवान् गोविन्द का सदा भजन करो।

इस भजन के बारे में

पद
8