Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

श्री कृष्णाष्टक

श्री कृष्णाष्टक भजे व्रजैक-मण्डनं समस्त-पाप-खण्डनं स्व-भक्त-चित्त-रञ्जनं सदैव नन्द-नन्दनम् सु-पिच्छ-गुच्छ-मस्तकं सु-नाद-वेणु-हस्तकम् अनङ्ग-रङ्ग-सागरं नमामि कृष्ण-नागरम्
अर्थ

मैं सदा उन भगवान् कृष्ण का भजन करता हूँ, जो नन्द के पुत्र हैं, जो व्रज के एकमात्र आभूषण हैं, जो सब पापों के टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं और जो अपने भक्तों के हृदय को आनन्द देते हैं। मैं उन नायक भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जिनका मस्तक मोरपंखों से सजा है, जिनके हाथ में मधुर स्वर वाली बाँसुरी है और जो कामदेव की लीलाओं के सागर हैं।

मनोज-गर्व-मोचनं विशाल-लोल-लोचनं विधूत-गोप-शोचनं नमामि पद्म-लोचनम् करारविन्द-भूधरं स्मितावलोक-सुन्दरं महेन्द्र-मान-दारणं नमामि कृष्ण-वारणम्
अर्थ

मैं कमल-नयन भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जो कामदेव का गर्व दूर करते हैं, जिनके बड़े नेत्र बहुत चंचल हैं और जो गोपों का शोक झटककर दूर कर देते हैं। मैं श्याम वर्ण भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने अपने कमल जैसे हाथ पर गोवर्धन पर्वत उठाया, जिनकी मुस्कराती चितवन सुन्दर है और जिन्होंने इन्द्र के अभिमान को चूर-चूर कर दिया।

कदम्ब-सून-कुण्डलं सु-चारु-गण्ड-मण्डलं व्रजाङ्गनैक-वल्लभं नमामि कृष्ण-दुर्लभम् यशोदया स-मोदया स-गोपया स-नन्दया युतं सुखैक-नायकम् नमामि गोप-नायकम्
अर्थ

मैं उन भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जिन्हें पाना कठिन है, जो कदम्ब के फूल का कुण्डल पहनते हैं, जिनके गालों का मण्डल बहुत सुन्दर है और जो व्रज की बालाओं के एकमात्र प्रियतम हैं। मैं उन भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जो लीलामय गोप-बालक हैं और जो यशोदा, नन्द और गोपजनों के साथ ऐसी लीलाएँ करते हैं जिनसे वे सब आनन्दित होते हैं।

सदैव पाद-पङ्कजं मदीय-मानसे निजम् दधानम् उत्तमालकं नमामि नन्द-बालकम् समस्त-दोष-शोषणं समस्त-लोक-पोषणं समस्त-गोप-मानसं नमामि कृष्ण-लालसम्
अर्थ

मैं नन्द के नन्हे बालक भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जो अपने कुंकुम से लिप्त चरण-कमलों को सदा मेरे हृदय में रखते हैं। मैं प्रसन्नचित्त भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जो सब दोषों को सुखा देते हैं, सब लोकों को समृद्ध करते हैं और सब गोपजनों के चित्त में बसे रहते हैं।

भुवो भरावतारकं भवाब्धि-कर्णधारकं यशोमती-किशोरकं नमामि दुग्ध-चोरकम् दृग्-अन्त-क्रन्त-भङ्गिनं सदा-सदालि-सङ्गिनं दिने दिने नवं नवं नमामि नन्द-सम्भवम्
अर्थ

मैं दूध के चोर भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने पृथ्वी का भार उतारा, जो जन्म-मृत्यु के सागर को पार कराने वाली नाव के कर्णधार हैं और जो यशोदा के किशोर पुत्र हैं। मैं नन्द के पुत्र भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जो अपनी आँखों के कोनों से तिरछी चितवन डालते हैं, जो सदा गोपियों के साथ रहते हैं और जो दिन-प्रतिदिन नई-नई लीलाएँ करते हैं।

गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपावरं सुर-द्विषन्-निकन्दनं नमामि गोप-नन्दनम् नवीन-गोप-नागरं नवीन-केलि-लम्पटं नमामि मेघ-सुन्दरं तडित्-प्रभा-लसत्-पटम्
अर्थ

मैं उन भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जो दिव्य गुणों की खान हैं, दिव्य आनन्दों की खान हैं, कृपा की खान हैं, जो देवताओं के शत्रुओं को परास्त करते हैं और जो गोपजनों को आनन्द देते हैं। मैं उन भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जो गोपों के नवयुवक नायक हैं, जो नई-नई लीलाओं के लिए लालायित चंचल रसिक हैं, जो वर्षा के मेघ के समान सुन्दर और श्याम हैं और जिनके पीले वस्त्र बिजली की तरह चमकते हैं।

समस्त-गोप-नन्दनं हृद्-अम्बुजैक-मोहनं नमामि कुञ्ज-मध्य-गं प्रसन्न-भानु-शोभनम् निकाम-काम-दायकं दृग्-अन्त-चारु-सायकं रसाल-वेणु-गायकं नमामि कुञ्ज-नायकम्
अर्थ

मैं उन भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जो समस्त गोपजनों को आनन्द देते हैं, जो भक्तों के हृदय-कमलों को मोह लेते हैं, जो वन के कुंजों में रहते हैं और जो चमकते हुए सूर्य के समान शोभायमान हैं। मैं उन भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जो सब कामनाएँ पूर्ण करते हैं, जिनकी तिरछी चितवन सुन्दर बाण है, जिनकी वंशी की तान अमृत है और जो वन-कुंजों के रसिक नायक हैं।

विदग्ध-गोपिका-मनो-मनोज्ञ-तल्प-शायिनं नमामि मुञ्ज-कानने प्रवृद्ध-वह्नि-पायिनम् यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्ण-सत्-कथा मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम्
अर्थ

मैं उन भगवान् कृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करता हूँ, जो चतुर गोपियों के हृदय की मनोहर शय्या पर विश्राम करते हैं और जिन्होंने मुंजाटवी वन में भड़की हुई दावाग्नि को पी लिया। मैं प्रार्थना करता हूँ कि मैं जब भी और जैसे भी उनकी महिमा गाऊँ, भगवान् कृष्ण मुझ पर कृपा करें।

प्रमाणिकाष्टक-द्वयं जपत्य् अधीत्य यः पुमान् भवेत् स नन्द-नन्दने भवे भवे सु-भक्तिमान्
अर्थ

मैं प्रार्थना करता हूँ कि जो कोई इन आठ प्रार्थनाओं को पढ़ता या जपता है, वह नन्द के पुत्र के प्रति प्रगाढ़ भक्ति वाला हो और जन्म-जन्म तक उनका भक्त बना रहे।

इस भजन के बारे में

पद
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