Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

श्री कृष्णचन्द्र

अपूर्व अद्भूत तत्त्व सर्व-शक्तिमान् आनन्द-स्वरूप यँहार अनन्त आख्यान
अर्थ

वे अद्भुत और रहस्यमय परम तत्त्व सर्वशक्तिमान हैं, आनन्द के साक्षात् स्वरूप हैं और अनन्त नामों से जाने जाते हैं।

अनुभवानन्द-मात्र हृदये प्रकाश वेद सब बले यँरे अक्षर आकाश
अर्थ

जब कोई दिव्य आनन्द का अनुभव करता है, तब वे तुरन्त उसके हृदय में प्रकट हो जाते हैं। सभी वेद उन्हें अविनाशी परमात्मा कहते हैं।

सृष्ठि-स्थिति-प्रलयेर स्वरूप कारण ब्रह्म परमात्मा याँ’र शक्ति आवरण
अर्थ

ब्रह्म, परमात्मा और अपनी आवृत शक्ति (माया) के द्वारा वे ही सृष्टि, पालन और प्रलय के मूल कारण हैं।

याँ’र माया-शक्ति-वशे जड सृष्ठि हय याँ’र जीव-शक्ति हय जीवेर निलय
अर्थ

उनकी माया-शक्ति के प्रभाव से जड़ जगत की सृष्टि होती है, और उनकी जीव-शक्ति जीवों का आश्रय-स्थान है।

चिच्छक्ति विलास याँ’र वैकुण्ठे सृजन सेइ त’ अद्वय-तत्त्व व्रजेन्द्र-नन्दन
अर्थ

उनकी चित्-शक्ति की लीलाओं से वैकुण्ठ प्रकट होता है। वास्तव में वे ही अद्वय-तत्त्व (अद्वितीय परम सत्य) व्रजेन्द्रनन्दन हैं।

जीवेर आत्माय आच्छे दहर-सुन्दर व्रज-धाम बलि ता’र हय नामान्तर
अर्थ

वे सुन्दर किशोर जीव की आत्मा में परमात्मा रूप से विराजमान हैं। उन्हीं का दूसरा नाम व्रज-धाम है।* (*अनुवादक की टिप्पणी: अर्थात् व्रज-धाम स्वयं श्रीकृष्ण से अभिन्न है और हृदय में प्रकट होता है। श्रीकृष्ण-संहिता में भक्तिविनोद ठाकुर बताते हैं कि इस जगत के जीवों की शुद्ध चेतना में वैकुण्ठ-तत्त्व का प्रकट होना ही व्रज कहलाता है।)

तथा जीव व्रज-राज नन्द नाम धरि वात्सल्य-आनन्दे सदा सेवेन श्री-हरि
अर्थ

वहाँ जीव नन्द नाम वाले व्रजराज का आश्रय लेता है। वात्सल्य रस के आनन्द में वह सदा श्रीहरि की सेवा करता है।

चारि-विध रस जीव तथा भोग करे मधुर रसेते शेषे सेवे प्राणेश्वरे
अर्थ

वहाँ जीव चारों प्रकार के रसों का आस्वादन कर सकता है, और अन्त में मधुर रस में अपने प्राणनाथ की सेवा कर सकता है।

मधुर रसेते कृष्णे माधुर्य-प्रधान ऐश्वर्य सत्त्वेत्त ता’र नाहिक विधान
अर्थ

श्रीकृष्ण के प्रति मधुर रस में माधुर्य ही प्रधान है। ऐश्वर्य होते हुए भी उस पर ध्यान नहीं दिया जाता।

व्रज-वासी नाहि माने कृष्णेर ऐश्वर्य ऐकान्तिकी प्रेमे देखे माधुर्येर धूर्य
अर्थ

व्रजवासी कभी श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य के बारे में नहीं सोचते। अपने अनन्य प्रेम के कारण वे माधुर्य को ही श्रेष्ठ मानते हैं।

कृष्ण-रूप आहा या’र पशिल नयने तृष्णा ता’र नाहि थाके आर अन्य जने
अर्थ

जिसकी आँखों ने श्रीकृष्ण का परम अद्भुत रूप देख लिया, उसे फिर किसी और की प्यास नहीं रहती।

सु-स्निग्ध श्यामल-रूप नव-घन कान्ति जीवेर आपित मने वरषिछे शान्ति
अर्थ

उनका नित्य-नवीन रूप देखने में अत्यन्त मनोहर है। उनका श्याम शरीर नए उमड़े वर्षा-मेघ जैसी कान्ति वाला है, जो जीव के दुःखी मन पर शान्ति बरसाता है।

आकर्शणी वंशी-नाद पशिया श्रवणे माताय जीवेर मन आसव सिञ्चने
अर्थ

उनकी सर्वाकर्षक वंशी की ध्वनि सुनते ही मतवाले जीव का मन अमृत से भर जाता है।

ये शुनिल सेइ नाद हैल पागल छाडिल संसार-चिन्ता हैया विकल
अर्थ

जो वह तान सुन लेता है, वह पागल हो जाता है। वह घर-गृहस्थी की सारी चिन्ता छोड़ देता है और विकल हो उठता है।

त्रि-काले त्रि-भङ्गी श्याम अपूर्व दर्शन जीव लागि गोप-वेश जीवेर जीवन
अर्थ

भूत, वर्तमान और भविष्य, तीनों कालों में त्रिभंगी श्याम का दर्शन अद्भुत है। जीवों के हित के लिए उन्होंने ग्वाल-बाल का वेश धारण किया है, वे ही जीवों के जीवन हैं।

शिखि-पुच्छ नित्यानन्द-शिरे शोभ करे एमन दर्शन का’र मन नाहि हरे
अर्थ

मोर-पंख उनके नित्य आनन्दमय मस्तक की शोभा बढ़ाता है। ऐसा दर्शन किसका मन नहीं हर लेता?

प्रियतम कृष्ण-रूप मधुर भाण्डार यार एक कणे मण्ड करिछे संसार
अर्थ

श्रीकृष्ण का यह परम प्रिय रूप माधुर्य का भण्डार है, जिसके एक छोटे-से कण ने सारे संसार को मोहित कर रखा है।

मधु हैते मधु सेइ ताहा हैते मिष्ठ ताहा हैते अति मधु ताहारो वरिष्ठ
अर्थ

वे मधु के सार जैसे हैं, और उससे भी अधिक मीठे हैं। और उनसे भी अधिक मधुर हैं उनकी परम श्रेष्ठ प्रिया (श्रीराधा)।

कदम्ब-कानने कृष्ण करे वंशी-रव उन्मत हैया उथे विधि-वधु सव
अर्थ

कदम्ब-वन में श्रीकृष्ण ने वंशी बजाई, और समाज के नियमों का पालन करने वाली सभी पतिव्रता स्त्रियाँ उन्मत्त हो उठीं।

वेद-विधि गृह-धर्मे पतिरूपे वरि आछिल निश्चिन्त जीव गोपी वेश धरि
अर्थ

वे गृहस्थी के कर्तव्य ठीक से निभाते हुए वेदों के नियमों का पालन करती थीं। इन जीवों के मन में और कोई विचार नहीं था, और इन्होंने गोपियों का रूप धारण किया था।

कृष्ण-वांशी काने पाशि’ करिल पागल गृह ह’ते चित्त तबे हैल चञ्चल
अर्थ

तब श्रीकृष्ण की वंशी की ध्वनि उनके कानों में पड़ी और उसने उन्हें उन्मत्त कर दिया। घरों में रहते हुए भी उनके हृदय चंचल हो उठे।

आर कि सामान्य पति चित्त राखि पारे कृष्ण-वंशी वृन्दावने आकर्षिल या’रे
अर्थ

तो क्या कोई साधारण पति उनके मन को रोक सकता है, जिन्हें श्रीकृष्ण की वंशी ने वृन्दावन की ओर खींच लिया हो?

एइरूप जीव ल’ये श्याम-नटवर सनातन व्रज-लीला करे निरन्तर
अर्थ

इस प्रकार जीव श्याम नटवर (नर्तकों में श्रेष्ठ श्याम) को अपनाते हैं और सनातन व्रज-लीला में लगे रहते हैं।

प्रेम-रस-विशारद माताइया नरे प्रेमेर उच्छता सदा वितरण करे
अर्थ

प्रेम-रस में निपुण वे जीवों को मतवाला कर देते हैं। इस प्रकार वे निरन्तर सर्वोच्च दिव्य प्रेम बाँटते रहते हैं।

आत्माराम श्री-कृष्णेर विनोद-रञ्जन जीवेर मङ्गल-हेतु जान साधु-जन
अर्थ

हे साधुजनो! कृपया समझिए कि आत्माराम श्रीकृष्ण का यह आनन्दमय विनोद जीवों का मंगल करने के लिए है।

ब्रह्म-परमात्मा-कृष्ण तत्त्वे एक हय तबु कृष्ण जीव-पति जानह निश्चय
अर्थ

ब्रह्म और परमात्मा कृष्ण-तत्त्व से अभिन्न हैं। फिर भी निश्चय जानिए कि श्रीकृष्ण ही जीवों के स्वामी हैं।

लीला-रूपी ब्रह्म हय कृष्णेर प्राकृति कृष्ण-लीला विना जीवे ना छाडे संसृति
अर्थ

श्रीकृष्ण स्वभाव से ही लीला-रूपी ब्रह्म हैं (दिव्य लीलाएँ प्रकट करने वाले परम सत्य)। कृष्ण-लीला से सम्बन्ध के बिना जीव कभी संसार-बन्धन नहीं छोड़ पाता।

अतएव कृष्ण हय जीवेर जीवन कृष्ण विना जीव नाहि भजे अन्य जन
अर्थ

अतः श्रीकृष्ण ही जीव के जीवन हैं। श्रीकृष्ण के बिना जीव का कोई अस्तित्व नहीं, इसलिए उसे किसी और की उपासना नहीं करनी चाहिए।

कृष्ण जीव, जीवे कृष्न देख नित्य-काल आर यत चिन्ता सव जिवेर जञ्जाल
अर्थ

सदा यह देखना चाहिए कि जीव श्रीकृष्ण के अंश हैं और श्रीकृष्ण भी जीव के भीतर हैं। इसके अतिरिक्त सारे विचार जीवों के लिए बिल्कुल व्यर्थ हैं।

जीव से कृष्णेर सखा, अपराध-क्रमे बहिर्-मुख ह’ये जडे कत रूपे भ्रमे
अर्थ

जीव श्रीकृष्ण का सखा है, पर अपराधों के कारण वह उनसे विमुख हो जाता है और इस जड़ जगत में अनेक रूपों में भटकता रहता है।

कृष्ण तबु जीवे छाडि’ रहिते ना पारे यथा जीव याय, तथा आपने विस्तारे
अर्थ

फिर भी श्रीकृष्ण जीव को छोड़कर अलग नहीं रह पाते। जीव जहाँ भी जाता है, वे स्वयं का विस्तार करके वहाँ पहुँच जाते हैं।

जीवेर विचार-भूमि मथुरा नगरी नास्तिकता कंस तथा आच्छे दण्ड धरि
अर्थ

जीव की विचार-भूमि मथुरा नगरी है, और वहाँ कंस के रूप में नास्तिकता दण्ड लिए खड़ी है।* (*अनुवादक की टिप्पणी: विचार-भूमि का अर्थ है वह भूमि जहाँ व्यक्ति की योग्यता के अनुसार न्याय किया जाता है।)

देवक-नन्दिनी मन भगिनी ताहार शुद्ध-सत्त्व वसुदेवे परिणय या’र
अर्थ

कंस की बहन देवक की पुत्री है, जो मन की प्रतीक है। उसका विवाह वसुदेव से होता है, जो शुद्ध सत्त्व के प्रतीक हैं।

सेइ दुइ ह’ते कृष्ण हैबे प्रकाश एइरूप वाक्ये कंस करिया विश्वास
अर्थ

इन दोनों से श्रीकृष्ण प्रकट होंगे, कंस इस वाणी पर विश्वास कर लेता है।

उभये राखिल वन्दि निज कारागारे अधीनता-शृङ्खलेते विदित संसारे
अर्थ

इसलिए वह दोनों को अपने कारागार में बन्दी बनाकर रखता है। अधीनता और बन्धन ही सांसारिक जीवन को चलाते हैं।

अजन्मा हैता कृष्ण देवकी-जठरे जीवेर कल्याण लागि’ दिव्य देह धरे
अर्थ

अजन्मा होते हुए भी श्रीकृष्ण देवकी के गर्भ में प्रकट होते हैं। जीवों के कल्याण के लिए वे ऐसा दिव्य रूप धारण करते हैं।

प्रसूत हैले कृष्ण पिता महाशय आत्म-भूमि व्रज-धामे राखिल तनय
अर्थ

श्रीकृष्ण के जन्म लेने पर उनके पूज्य पिता अपने पुत्र को अपनी ही भूमि व्रज-धाम में रख आते हैं।

दिने दिने वाडे कृष्ण आनन्द-निलये ताँ’रे मारिवारे कंस प्रेरे सैन्यचरे
अर्थ

दिन-प्रतिदिन श्रीकृष्ण अपने आनन्द-भरे घर में बड़े होते हैं, और उन्हें मारने के लिए कंस सेनाएँ और गुप्तचर भेजता है।

माया-रूपी पूतना, विन्तण्ड तृणावर्त धूर्तता-स्वरूप बक प्रभृति अनर्थ
अर्थ

पूतना वेश बदलकर आती है। तृणावर्त व्यर्थ के तर्क-वितर्क का प्रतीक है, बक धूर्तता का साक्षात् रूप है, और दूसरे असुर अनर्थों के प्रतीक हैं।

कृष्ण-तत्त्व-सन्निधाने पाप नाहि रय नास्तिकता-सैन्य सव शिघ्र हय क्षय
अर्थ

कृष्ण-तत्त्व के निकट आने पर पाप नहीं टिकता। नास्तिकता की सारी सेना शीघ्र ही नष्ट हो जाती है।

विश्वास मन्दिर सेइ नन्देर निलय कत-दिन लीला तथा करे दयामय
अर्थ

नन्द का घर विश्वास का मन्दिर है। परम दयालु भगवान् कुछ समय तक वहाँ अपनी लीला करते हैं।

विश्वासेर पकृआवस्था उदय यखन कैशोर वयसे पुनः मथुरा गमन
अर्थ

जब विश्वास की परिपक्व अवस्था उदित होती है, तब श्रीकृष्ण किशोर अवस्था में पहुँचकर फिर से मथुरा जाते हैं।

कंस नाश शुद्ध-सत्त्व मनेर बन्धन अवलीला-क्रमे कृष्ण करेन छेदन
अर्थ

कंस-वध का अर्थ है वह क्षण, जब श्रीकृष्ण शुद्ध सत्त्व में स्थित मन के बन्धन को सहज ही काट देते हैं।

कर्म-काण्ड जरासन्ध नास्तिक-श्वशुर बहु-सैन्य ल’ये घेरे विचरेर पुर
अर्थ

कर्मकाण्ड का प्रतीक जरासन्ध उस नास्तिक का ससुर है। वह विशाल सेना लेकर विश्वास की नगरी को घेर लेता है।

यथा कृष्ण तथा नाहि विपक्षेर बल सप्त-दश बार जरा हयत विरल
अर्थ

जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ विरोधी पक्ष का कोई बल नहीं चलता। सत्रह बार जरासन्ध अपने प्रयासों में विफल हुआ।

कर्म-काण्ड जड-भाव बद्ध-जीव सने थाकिबे बद्धता नाश पर्यन्त भुवने
अर्थ

कर्मकाण्ड के बन्धन का जड़ प्रभाव बद्ध जीवों में बना रहता है, और संसार के अन्त तक बना रहेगा।

दुष्ट-काल काल-नामा यवनेर छिले यदु-कुल लय कृष्न समुद्रेर कूले
अर्थ

काल नाम का यवन अशुभ समय का प्रतीक है। तब श्रीकृष्ण यदुवंश को समुद्र के तट पर ले जाते हैं।

वेद-विधिमय पुरी द्वारका विस्तारि राखेन आश्रित-जने तथाय मुरारि
अर्थ

वेदों के सभी विधानों की प्रतीक द्वारका नगरी का विस्तार करके मुरारि वहाँ अपने आश्रितों की रक्षा करते हैं।

एइरूप नित्य-लीला मनुष्येर मने करेन हृदय-नाथ सदाइ भुवने
अर्थ

इस प्रकार वे मनुष्यों के मन में अपनी नित्य-लीला करते हैं, जैसे हृदय के स्वामी इस संसार में निरन्तर करते रहते हैं।

अनन्त ब्रह्माण्डे यत आच्छे जीव-गन सकले-इ एइ लीला देखे अनुक्षण
अर्थ

अनन्त ब्रह्माण्डों में जितने भी जीव हैं, वे सब इस लीला को निरन्तर देख सकते हैं।

नामान्तरे रूपान्तरे ए लीला वर्णन सर्व-देशे, सर्व-काले करे सर्व-जन
अर्थ

इस लीला का वर्णन अलग-अलग नामों से होता है और यह अलग-अलग रूप ले लेती है। सब लोग, सब देशों में और सब कालों में ऐसा करते हैं।

अतएव अन्य काण्ढ छाडि अन्य आशा भज कृष्न, विषयेर घूचिबे पिपास
अर्थ

अतः अन्य कर्मों और अन्य इच्छाओं को छोड़कर कृपया श्रीकृष्ण का भजन कीजिए, तब विषयों के लिए आपकी प्यास बुझ जाएगी।

ये व्रजेर भास मात्र एखन दर्शन सेइ नित्य-धाम तव हैबे भवन
अर्थ

आप यहाँ जो देख रहे हैं, वह व्रज की केवल एक झलक है, पर वही नित्य धाम आपका घर बन सकता है।

‘कृष्ण कृष्न,’ बल भाइ चैतन्य-कृपाय दीन केदर्नाथ एइ कृष्न-गीत गाय
अर्थ

हे भाइयो! श्रीचैतन्य महाप्रभु की कृपा से “कृष्ण! कृष्ण!” कहिए। दीन केदारनाथ यह कृष्ण-गीत गाता है।

इस भजन के बारे में

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