श्री कृष्णचन्द्र
वे अद्भुत और रहस्यमय परम तत्त्व सर्वशक्तिमान हैं, आनन्द के साक्षात् स्वरूप हैं और अनन्त नामों से जाने जाते हैं।
जब कोई दिव्य आनन्द का अनुभव करता है, तब वे तुरन्त उसके हृदय में प्रकट हो जाते हैं। सभी वेद उन्हें अविनाशी परमात्मा कहते हैं।
ब्रह्म, परमात्मा और अपनी आवृत शक्ति (माया) के द्वारा वे ही सृष्टि, पालन और प्रलय के मूल कारण हैं।
उनकी माया-शक्ति के प्रभाव से जड़ जगत की सृष्टि होती है, और उनकी जीव-शक्ति जीवों का आश्रय-स्थान है।
उनकी चित्-शक्ति की लीलाओं से वैकुण्ठ प्रकट होता है। वास्तव में वे ही अद्वय-तत्त्व (अद्वितीय परम सत्य) व्रजेन्द्रनन्दन हैं।
वे सुन्दर किशोर जीव की आत्मा में परमात्मा रूप से विराजमान हैं। उन्हीं का दूसरा नाम व्रज-धाम है।* (*अनुवादक की टिप्पणी: अर्थात् व्रज-धाम स्वयं श्रीकृष्ण से अभिन्न है और हृदय में प्रकट होता है। श्रीकृष्ण-संहिता में भक्तिविनोद ठाकुर बताते हैं कि इस जगत के जीवों की शुद्ध चेतना में वैकुण्ठ-तत्त्व का प्रकट होना ही व्रज कहलाता है।)
वहाँ जीव नन्द नाम वाले व्रजराज का आश्रय लेता है। वात्सल्य रस के आनन्द में वह सदा श्रीहरि की सेवा करता है।
वहाँ जीव चारों प्रकार के रसों का आस्वादन कर सकता है, और अन्त में मधुर रस में अपने प्राणनाथ की सेवा कर सकता है।
श्रीकृष्ण के प्रति मधुर रस में माधुर्य ही प्रधान है। ऐश्वर्य होते हुए भी उस पर ध्यान नहीं दिया जाता।
व्रजवासी कभी श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य के बारे में नहीं सोचते। अपने अनन्य प्रेम के कारण वे माधुर्य को ही श्रेष्ठ मानते हैं।
जिसकी आँखों ने श्रीकृष्ण का परम अद्भुत रूप देख लिया, उसे फिर किसी और की प्यास नहीं रहती।
उनका नित्य-नवीन रूप देखने में अत्यन्त मनोहर है। उनका श्याम शरीर नए उमड़े वर्षा-मेघ जैसी कान्ति वाला है, जो जीव के दुःखी मन पर शान्ति बरसाता है।
उनकी सर्वाकर्षक वंशी की ध्वनि सुनते ही मतवाले जीव का मन अमृत से भर जाता है।
जो वह तान सुन लेता है, वह पागल हो जाता है। वह घर-गृहस्थी की सारी चिन्ता छोड़ देता है और विकल हो उठता है।
भूत, वर्तमान और भविष्य, तीनों कालों में त्रिभंगी श्याम का दर्शन अद्भुत है। जीवों के हित के लिए उन्होंने ग्वाल-बाल का वेश धारण किया है, वे ही जीवों के जीवन हैं।
मोर-पंख उनके नित्य आनन्दमय मस्तक की शोभा बढ़ाता है। ऐसा दर्शन किसका मन नहीं हर लेता?
श्रीकृष्ण का यह परम प्रिय रूप माधुर्य का भण्डार है, जिसके एक छोटे-से कण ने सारे संसार को मोहित कर रखा है।
वे मधु के सार जैसे हैं, और उससे भी अधिक मीठे हैं। और उनसे भी अधिक मधुर हैं उनकी परम श्रेष्ठ प्रिया (श्रीराधा)।
कदम्ब-वन में श्रीकृष्ण ने वंशी बजाई, और समाज के नियमों का पालन करने वाली सभी पतिव्रता स्त्रियाँ उन्मत्त हो उठीं।
वे गृहस्थी के कर्तव्य ठीक से निभाते हुए वेदों के नियमों का पालन करती थीं। इन जीवों के मन में और कोई विचार नहीं था, और इन्होंने गोपियों का रूप धारण किया था।
तब श्रीकृष्ण की वंशी की ध्वनि उनके कानों में पड़ी और उसने उन्हें उन्मत्त कर दिया। घरों में रहते हुए भी उनके हृदय चंचल हो उठे।
तो क्या कोई साधारण पति उनके मन को रोक सकता है, जिन्हें श्रीकृष्ण की वंशी ने वृन्दावन की ओर खींच लिया हो?
इस प्रकार जीव श्याम नटवर (नर्तकों में श्रेष्ठ श्याम) को अपनाते हैं और सनातन व्रज-लीला में लगे रहते हैं।
प्रेम-रस में निपुण वे जीवों को मतवाला कर देते हैं। इस प्रकार वे निरन्तर सर्वोच्च दिव्य प्रेम बाँटते रहते हैं।
हे साधुजनो! कृपया समझिए कि आत्माराम श्रीकृष्ण का यह आनन्दमय विनोद जीवों का मंगल करने के लिए है।
ब्रह्म और परमात्मा कृष्ण-तत्त्व से अभिन्न हैं। फिर भी निश्चय जानिए कि श्रीकृष्ण ही जीवों के स्वामी हैं।
श्रीकृष्ण स्वभाव से ही लीला-रूपी ब्रह्म हैं (दिव्य लीलाएँ प्रकट करने वाले परम सत्य)। कृष्ण-लीला से सम्बन्ध के बिना जीव कभी संसार-बन्धन नहीं छोड़ पाता।
अतः श्रीकृष्ण ही जीव के जीवन हैं। श्रीकृष्ण के बिना जीव का कोई अस्तित्व नहीं, इसलिए उसे किसी और की उपासना नहीं करनी चाहिए।
सदा यह देखना चाहिए कि जीव श्रीकृष्ण के अंश हैं और श्रीकृष्ण भी जीव के भीतर हैं। इसके अतिरिक्त सारे विचार जीवों के लिए बिल्कुल व्यर्थ हैं।
जीव श्रीकृष्ण का सखा है, पर अपराधों के कारण वह उनसे विमुख हो जाता है और इस जड़ जगत में अनेक रूपों में भटकता रहता है।
फिर भी श्रीकृष्ण जीव को छोड़कर अलग नहीं रह पाते। जीव जहाँ भी जाता है, वे स्वयं का विस्तार करके वहाँ पहुँच जाते हैं।
जीव की विचार-भूमि मथुरा नगरी है, और वहाँ कंस के रूप में नास्तिकता दण्ड लिए खड़ी है।* (*अनुवादक की टिप्पणी: विचार-भूमि का अर्थ है वह भूमि जहाँ व्यक्ति की योग्यता के अनुसार न्याय किया जाता है।)
कंस की बहन देवक की पुत्री है, जो मन की प्रतीक है। उसका विवाह वसुदेव से होता है, जो शुद्ध सत्त्व के प्रतीक हैं।
इन दोनों से श्रीकृष्ण प्रकट होंगे, कंस इस वाणी पर विश्वास कर लेता है।
इसलिए वह दोनों को अपने कारागार में बन्दी बनाकर रखता है। अधीनता और बन्धन ही सांसारिक जीवन को चलाते हैं।
अजन्मा होते हुए भी श्रीकृष्ण देवकी के गर्भ में प्रकट होते हैं। जीवों के कल्याण के लिए वे ऐसा दिव्य रूप धारण करते हैं।
श्रीकृष्ण के जन्म लेने पर उनके पूज्य पिता अपने पुत्र को अपनी ही भूमि व्रज-धाम में रख आते हैं।
दिन-प्रतिदिन श्रीकृष्ण अपने आनन्द-भरे घर में बड़े होते हैं, और उन्हें मारने के लिए कंस सेनाएँ और गुप्तचर भेजता है।
पूतना वेश बदलकर आती है। तृणावर्त व्यर्थ के तर्क-वितर्क का प्रतीक है, बक धूर्तता का साक्षात् रूप है, और दूसरे असुर अनर्थों के प्रतीक हैं।
कृष्ण-तत्त्व के निकट आने पर पाप नहीं टिकता। नास्तिकता की सारी सेना शीघ्र ही नष्ट हो जाती है।
नन्द का घर विश्वास का मन्दिर है। परम दयालु भगवान् कुछ समय तक वहाँ अपनी लीला करते हैं।
जब विश्वास की परिपक्व अवस्था उदित होती है, तब श्रीकृष्ण किशोर अवस्था में पहुँचकर फिर से मथुरा जाते हैं।
कंस-वध का अर्थ है वह क्षण, जब श्रीकृष्ण शुद्ध सत्त्व में स्थित मन के बन्धन को सहज ही काट देते हैं।
कर्मकाण्ड का प्रतीक जरासन्ध उस नास्तिक का ससुर है। वह विशाल सेना लेकर विश्वास की नगरी को घेर लेता है।
जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ विरोधी पक्ष का कोई बल नहीं चलता। सत्रह बार जरासन्ध अपने प्रयासों में विफल हुआ।
कर्मकाण्ड के बन्धन का जड़ प्रभाव बद्ध जीवों में बना रहता है, और संसार के अन्त तक बना रहेगा।
काल नाम का यवन अशुभ समय का प्रतीक है। तब श्रीकृष्ण यदुवंश को समुद्र के तट पर ले जाते हैं।
वेदों के सभी विधानों की प्रतीक द्वारका नगरी का विस्तार करके मुरारि वहाँ अपने आश्रितों की रक्षा करते हैं।
इस प्रकार वे मनुष्यों के मन में अपनी नित्य-लीला करते हैं, जैसे हृदय के स्वामी इस संसार में निरन्तर करते रहते हैं।
अनन्त ब्रह्माण्डों में जितने भी जीव हैं, वे सब इस लीला को निरन्तर देख सकते हैं।
इस लीला का वर्णन अलग-अलग नामों से होता है और यह अलग-अलग रूप ले लेती है। सब लोग, सब देशों में और सब कालों में ऐसा करते हैं।
अतः अन्य कर्मों और अन्य इच्छाओं को छोड़कर कृपया श्रीकृष्ण का भजन कीजिए, तब विषयों के लिए आपकी प्यास बुझ जाएगी।
आप यहाँ जो देख रहे हैं, वह व्रज की केवल एक झलक है, पर वही नित्य धाम आपका घर बन सकता है।
हे भाइयो! श्रीचैतन्य महाप्रभु की कृपा से “कृष्ण! कृष्ण!” कहिए। दीन केदारनाथ यह कृष्ण-गीत गाता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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