Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

श्री वृन्दावनाष्टकम् (मुकुन्द-मुरली-रव)

मुकुन्द-मुरली-रव-श्रवण-फुल्ल-हृद्-बल्लवी कदम्बक-करम्बित-प्रति-कदम्ब-कुञ्जान्तरा कलिन्द-गिरि-नन्दिनी-कमल-कन्दलान्दोलिना सु-गन्धिर् अनिलेन मे शरणम् अस्तु वृन्दाटवी
अर्थ

जहाँ कदम्ब का हर कुंज उन गोपियों के समूहों से भरा है जिनके हृदय मुकुन्द की मुरली की ध्वनि सुनकर खिल उठते हैं, और जो यमुना के कमलों को झुलाती मन्द पवन से सुगन्धित रहता है, वह वृन्दावन मेरा आश्रय हो।

विकुण्ठ-पुर-संश्रयाद् विपिनतो 'पि निःश्रेयसात् सहस्र-गुणितां श्रियं प्रदुहती रस-श्रेयसीम् चतुर्मुख-मुखैर् अपि स्पृहित-तार्ण-देहोद्भवा जगद्-गुरुभिर् अग्रिमैः शरणम् अस्तु वृन्दाटवी
अर्थ

जो वैकुण्ठपुरी के निःश्रेयस वन से भी हज़ारों गुना अधिक, रस से भरपूर शोभा बरसाता है, और जहाँ चतुर्मुख ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ जगद्गुरु भी तिनके के रूप में जन्म लेने की इच्छा करते हैं, वह वृन्दावन मेरा आश्रय हो।

अनारत-विकस्वर-व्रतति-पुञ्ज-पुष्पावली विसारि-वर-सौरभोद्गम-रमा-चमत्कारिणी अमन्द-मकरन्द-भृद्-विटपि-वृन्द-वन्दी-कृत द्विरेफ-कुल-वन्दिता शरणम् अस्तु वृन्दाटवी
अर्थ

जहाँ सदा खिली रहने वाली लताओं के फूलों से फैलती उत्तम सुगन्ध लक्ष्मी देवी को भी चकित कर देती है, और जिसकी वन्दना वे भौंरे करते हैं जिन्हें भरपूर मकरन्द से लदे वृक्षों ने अपना स्तुति-गायक बना लिया है, वह वृन्दावन मेरा आश्रय हो।

क्षणद्युति-घन-श्रियोर् व्रज-नवीन-यूनोः पदैः सु-वल्गुभिर् अलङ्कृता ललित-लक्ष्म-लक्ष्मी-भरैः तयोर् नखर-मण्डली-शिखर-केलि-चर्योचितैर् वृता किशलयाङ्कुरैः शरणम् अस्तु वृन्दाटवी
अर्थ

जो बिजली और बादल जैसी शोभा वाले व्रज के नवयुवा युगल के मनोहर चरण-चिह्नों से सजा है, जिनमें सुन्दर रेखाओं की भरपूर शोभा है, और जो उन दोनों के नखों के अग्रभाग की लीला के योग्य कोमल कोंपलों और अंकुरों से ढका है, वह वृन्दावन मेरा आश्रय हो।

व्रजेन्द्र-सख-नन्दिनी-शुभतराधिकार-क्रिया प्रभावज-सुखोत्सव-स्फुरित-जङ्गम-स्थावरा प्रलम्ब-दमनानुज-ध्वनित-वंशिका-काकली रसज्ञ-मृग-मण्डला शरणम् अस्तु वृन्दाटवी
अर्थ

व्रजराज के सखा की पुत्री श्रीराधा के अत्यन्त मंगलमय शासन के प्रभाव से उपजे सुख-उत्सव में जहाँ सब चर और अचर प्राणी पुलकित रहते हैं, और जहाँ हिरनों के दल प्रलम्बासुर को मारने वाले बलराम के छोटे भाई श्रीकृष्ण की बाँसुरी की मधुर तान का रस जानते हैं, वह वृन्दावन मेरा आश्रय हो।

अमन्द-मुदिराम्बुदाभ्यधिक-माधुरी-मेदुर व्रजेन्द्र-सुत-वीक्षणोन्नटित-नील-कण्ठोत्करा दिनेश-सुहृद्-आत्मजा-कृत-निजाभिमानोल्लसल् लता-खग-मृगाङ्गना शरणम् अस्तु वृन्दाटवी
अर्थ

जहाँ घने वर्षा-मेघों से भी अधिक माधुर्य से भरे व्रजराज-कुमार को देखकर मोरों के दल उमंग से नाचने लगते हैं, और जहाँ की लताएँ, पक्षी और हिरनियाँ इस बात से उल्लसित रहती हैं कि वृषभानु-नन्दिनी श्रीराधा उन्हें अपना मानती हैं, वह वृन्दावन मेरा आश्रय हो।

अगण्य-गुण-नागरी-गण-गरिष्ठ-गान्धर्विका मनोज-रण-चातुरी-पिशुन-कुञ्ज-पुञ्जोज्ज्वला जगत्-त्रय-कला-गुरोर् ललित-लास्य-वल्गत्-पद प्रयोग-विधि-साक्षिणी शरणम् अस्तु वृन्दाटवी
अर्थ

अगणित गुणों वाली नागरियों में सर्वश्रेष्ठ गान्धर्विका श्रीराधा की प्रेम के मधुर द्वन्द्व में निपुणता को प्रकट करने वाले कुंजों से जो जगमगाता है, और जो तीनों लोकों के कला-गुरु श्रीकृष्ण के ललित नृत्य में थिरकते चरणों की हर विधि का साक्षी है, वह वृन्दावन मेरा आश्रय हो।

वरिष्ठ-हरि-दासता-पद-समृद्ध-गोवर्धना मधूद्वह-वधू-चमत्कृति-निवास-रास-स्थला अगूढ-गहन-श्रियो मधुरिम-व्रजेनोज्ज्वला व्रजस्य सहजेन मे शरणम् अस्तु वृन्दाटवी
अर्थ

जहाँ गोवर्धन पर्वत हरि के श्रेष्ठ सेवक की पदवी से धन्य है, जहाँ की रास-स्थली श्रीकृष्ण की प्रेयसी गोपियों के विस्मय का धाम है, और जो घने वनों की प्रकट शोभा तथा व्रज के सहज माधुर्य से जगमगाता है, वह वृन्दावन मेरा आश्रय हो।

इदं निखिल-निष्कुटावलि-वरिष्ठ-वृन्दाटवी गुण-स्मरण-कारि यः पठति सुष्ठु पद्याष्टकम् वसन् व्यसन-मुक्त-धीर् अनिशम् अत्र सद्-वासनः स पीत-वसने वशी रतिम् अवाप्य विक्रीडति
अर्थ

जो व्यक्ति सब उपवनों में श्रेष्ठ वृन्दावन के गुणों का स्मरण कराने वाले इन आठ श्लोकों का भली-भाँति पाठ करता है, जिसकी बुद्धि दोषों से मुक्त है, जो इन्द्रियों को वश में रखता है, जिसके संस्कार शुद्ध हैं और जो यहीं निरन्तर निवास करता है, वह पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम पाकर उनकी लीलाओं में आनन्द से विहार करता है।

इस भजन के बारे में

पद
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