श्रील शुकदेव गोस्वामी प्रणाम
मैं उन मुनि को प्रणाम करता हूँ जो सब प्राणियों के हृदय में बसे हैं। वे जनेऊ होने से पहले ही, बिना किसी कर्तव्य के बन्धन के, संन्यासी बनकर घर से निकल पड़े। तब उनके पिता द्वैपायन व्यास बिछुड़ने के दुःख से व्याकुल होकर पुकार उठे, "बेटा!" उस समय उनसे एक हुए वृक्षों ने उत्तर दिया।
मैं व्यास-पुत्र शुकदेव की शरण लेता हूँ, जो सब मुनियों के गुरु हैं। संसार के घोर अँधेरे को पार करना चाहने वाले जीवों पर करुणा करके उन्होंने यह गुप्त पुराण सुनाया। यह सारे वेदों का एकमात्र सार है, आत्मा को प्रकाशित करने वाला दीपक है और उनके अपने अनुभव से भरा है।
शुकदेव का मन अपने आत्म-आनन्द में डूबा हुआ था और बाकी सब भाव उनसे छूट चुके थे। फिर भी अजेय भगवान् की मनोहर लीलाओं ने उनका हृदय खींच लिया। तब उन्होंने कृपा करके भगवान् का तत्त्व दिखाने वाला यह पुराण सबको सुनाया। सब पापों को मिटाने वाले उन व्यास-पुत्र को मैं प्रणाम करता हूँ।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- कृष्ण द्वैपायन व्यास
- ग्रन्थ
- प्रणाम मन्त्र
- भाव
- पद
- 3