Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi
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टेक्स्ट
शुन-इते गौराङ्ग खेद मझु बुक नहे काहे भेद
अर्थ

जब मैं श्री गौरांग की व्यथा सुनता हूँ, तो मेरा हृदय टुकड़ों में क्यों नहीं बिखर जाता?

रो-इ कहये शुन मा-इ बिरह ज्वरहि ज्वरि या-इ
अर्थ

रोते हुए वे कहते हैं, "सुनो माँ! मैं विरह के ज्वर में जलता ही जा रहा हूँ।

पूटपाक शत गुण लेख मझु ताप आगे सो-इ रेख
अर्थ

"उबलती कड़ाहियों की गर्मी को सौ गुना बढ़ा दिया जाए, तो भी वह मेरे दुख की ज्वर-ज्वाला के समान नहीं है।

कालकूट शत गुण मान सो नह आछुक समान
अर्थ

"घातक कालकूट विष को सौ गुना बढ़ा दिया जाए, तो भी वह मेरे प्रियतम के विरह के विष के बराबर नहीं है।

बजरक शत गुण आगि से-इ इह आगे रहुं भागि
अर्थ

"वज्र के आघातों को सौ गुना बढ़ा दिया जाए, तो भी वे उन आघातों के समान नहीं जो भाग्य मुझ पर करता है।

हृदय निमगन शेल तासञे अधिकहि भेल
अर्थ

"मेरे हृदय में गड़ा हुआ भाला भी उस पीड़ा के समान नहीं है जो अब मुझे बेध रही है।

शत-गुण बिसूचि बेयाधि तासञे इह बड आधि
अर्थ

"जो रोग मुझे सता रहा है, वह किसी भी अन्य रोग से अधिक शक्तिशाली है।"

गौरक शुनि इह भाष भण राधामोहन दास
अर्थ

श्री गौर के इन वचनों को सुनकर राधामोहन इस गीत में उन्हें फिर से कहते हैं।