परम उपदेश
मैं व्यर्थ सांसारिक बातें न कहूँगा और न सुनूँगा, केवल परमार्थ की ही चर्चा करूँगा। मैं सदा उत्कण्ठा से अपने आराध्य की कथा हेतु प्रार्थना करूँगा, क्योंकि इसके बिना सब कुछ व्यर्थ है।
ईश्वर के तत्त्व का मैं कहाँ तक वर्णन करूँ, वह तो अनंत और अपार है, इसे कौन जान सकता है? परन्तु व्रज का प्रेम नित्य है, यही परम सत्य है। हे मन, इसी को अनुराग से भजो।
श्री गोविन्द, गोकुलचन्द्र, परम आनंद के स्रोत, गोप-गोपियों के परिवार सहित नन्दग्राम में निवास करते हैं और गिरिधारी नाम से विख्यात हैं। सखियों के संग उन्हें आनंदपूर्वक भजो।
हे भाई, मैंने तुम्हें प्रेम-भक्ति का यह तत्त्व बताया। अब बाकी सब दुर्वासनाएँ छोड़ दो। हे भाई, श्री गुरु की कृपा से ही यह सारा भजन मिलता है, और प्रेम-भक्ति में साधक सखियों की अनुचरी बनता है।
भजन-मार्ग की सफलता यही है, साधुओं के संग सदा कृष्ण-कथा का स्मरण और भजन करना। जब प्रेम-भक्ति प्राप्त होती है, तब मन शुद्ध हो जाता है और हृदय की व्यथा दूर हो जाती है।
विषय-भोग को संकट समझो, संसार को स्वप्न मानो। यह मनुष्य-शरीर भजन का मूल आधार है। सदा अनुराग सहित राधा-कृष्ण की प्रेम-लीला की कथा गाओ। बाकी सब कुछ हृदय के लिए कष्ट का कारण है।
श्री राधिका के चरणों की धूल से अपनी देह को सजाओ, तो सहज ही गिरिधारी मिल जाएँगे। जो राधिका के चरणों की शरण लेता है, वही महान है, मैं उस पर बलिहारी जाता हूँ।
जय जय श्री राधा का नाम, जिनका धाम वृन्दावन है, जो कृष्ण के सुख-विलास की निधि हैं। ऐसी राधा के गुण-गान को मेरे कानों ने अब तक नहीं सुना, क्योंकि विधि ने मुझे इससे वंचित रखा है।
जो सदा राधा के भक्तों के संग में उनकी रस-लीला और प्रेम की कथा कहता है, वह घनश्याम को अवश्य पाता है। जो इससे विमुख है, उसे कभी सिद्धि नहीं मिलती। मैं तो उसका नाम भी सुनना नहीं चाहता।
हे भाई, कृष्ण-नाम के कीर्तन से राधिका के चरण प्राप्त होते हैं, और राधा-नाम के कीर्तन से कृष्णचन्द्र प्राप्त होते हैं। मैंने संक्षेप में यह कथा कही है, जिससे मन की व्यथा दूर हो जाए। अन्य सभी बातें केवल दुःखमय द्वन्द्व हैं।
अहंकार और अभिमान त्याग दो, कुसंग और व्यर्थ ज्ञान की चेष्टा छोड़कर श्री गुरु के चरण-कमलों की भक्ति करो। अपनी देह, गृह और परिजनों को उन्हें समर्पित कर दो। गुरु के वचन ही सर्वोपरि महत्त्वपूर्ण हैं।
श्री कृष्ण चैतन्यदेव की अनुराग और लगन से सेवा करो, क्योंकि वे प्रेम देने वाले कल्पतरु हैं। वे स्वयं व्रजराज के पुत्र और श्री राधिका के जीवन-धन हैं। यह सब बात अद्भुत है।
श्री कृष्ण चैतन्यदेव ने राधा का भाव अपनाकर नवद्वीप में अवतार लिया, और राधा की कान्ति से अपने अंगों को सजाया। अपनी तीन इच्छाएँ पूरी करने के लिए वे अपने पार्षदों के साथ माता शची के गर्भ से प्रकट हुए।
गौरहरि ने अवतार लेकर प्रेम की वर्षा की और अपने मन की अभिलाषा पूर्ण की। वे श्री राधिका के प्राणपति हैं, और वे किस भाव में सदा रोते रहते हैं, यह केवल भक्त-समाज ही समझ सकता है।
गुप्त रूप से सिद्धि का साधन करते हुए नवधा भक्ति का अभ्यास करना चाहिए, और सदा दीनता से प्रार्थना करनी चाहिए। हरि-संकीर्तन करते हुए मन सदा उसी में विभोर रहे। इस इष्ट-लाभ के बिना और सब कुछ बाधा ही है।
यह संसार तुम्हें ठग रहा है, कामनाओं के फंदे में बाँधकर तुम्हें मार रहा है। हे हरिदास, पुकार करो। भक्तों का संग करो और प्रेम-कथा के रस-रंग में डूब जाओ, तभी तुम्हारा संकट नष्ट होगा।
पत्नी, पुत्र, बच्चे, कितने ही सैकड़ों की संख्या में मरते चले जाते हैं। अपने लिए सावधान हो जाओ। मैं विषयों से मारा गया हूँ, मैंने हरि के चरणों का भजन नहीं किया, अब मेरा कोई उद्धार नहीं।
मेरा एकमात्र प्रयोजन रामचन्द्र कविराज का संग पाना है, उनके संग के बिना सब कुछ शून्य लगता है। यदि मुझे पुनः जन्म लेना पड़े, तो भी उनका ही संग प्राप्त हो, तभी नरोत्तम का जीवन धन्य होगा।
अपने भजन की गुप्त बातें मैं जहाँ-तहाँ नहीं कहूँगा, इस विषय में मैं पूर्ण सावधान रहूँगा। कोई मुझसे रुष्ट न हो, और मेरा अपराध क्षमा करे। मैं भक्तों के चरणों में प्रणाम करता हूँ।
श्री गौरांग प्रभु ने मुझसे जो वाणी कहलवाई, वही मैंने यहाँ कह दी है। इसमें क्या भला और क्या बुरा है, यह मैं स्वयं नहीं जानता।
श्री लोकनाथ प्रभु के चरणों को हृदय में धारण करते हुए नरोत्तम दास ने यह 'प्रेम-भक्ति-चन्द्रिका' कही है।