Nandgram Dham
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वरय मधव मुद

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AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित

वरय मधव-मुद-वदनन्गम् स्प्र्सति यथयम् न सखि मद्-अन्गम्
अर्थ

हे सखी, आनन्द से दमकते मुख वाले माधव को रोको, कहीं वे मेरे शरीर का स्पर्श न कर बैठें।

किम् अयम् रचयति नयन-तरन्गम् कैरविनि न हि भजति पतन्गम्
अर्थ

वे मुझ पर ये लहराती हुई चितवनें क्यों डालते हैं? सच तो यह है कि श्वेत कुमुदिनी कभी सूर्य की ओर नहीं मुड़ती।

कम्पि-करन् मम पतति लवन्गम् त्वम् अपि तथपि न मुन्चसि रन्गम्
अर्थ

मेरा लौंग-पुष्प का आभूषण काँपकर गिर पड़ता है, फिर भी तुम अपनी क्रीड़ा नहीं छोड़ते।

किम् अपि सनतन-धर्मम् अभन्गम् न परिहरिस्ये ह्र्दि क्र्त-सन्गम्
अर्थ

यह तो मानो कोई सनातन, अटूट नियम ही है, मैं अपने हृदय में बन चुके इस बन्धन को कभी नहीं त्यागूँगी।