वारय माधवम् उद्यद् अनङ्गम्
हे सखी, आनन्द से दमकते मुख वाले माधव को रोको, कहीं वे मेरे शरीर का स्पर्श न कर बैठें।
वे मुझ पर ये लहराती हुई चितवनें क्यों डालते हैं? सच तो यह है कि श्वेत कुमुदिनी कभी सूर्य की ओर नहीं मुड़ती।
मेरे काँपते हाथ से लौंग गिर पड़ती है, फिर भी तुम भी अपना विनोद नहीं छोड़तीं।
मैं अपने हृदय में बसाए हुए इस सनातन, अटूट धर्म को कभी नहीं त्यागूँगी।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रूप गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 4