व्रज नव युव रजस्तकम्
AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित
जो अपने अंगों की कान्ति से वर्षा-मेघों के विशाल गर्व को चूर-चूर कर देते हैं, जिनके वस्त्र की चमक कमल की केसर की शोभा को भी मात देती है, जिनके बाल्यकाल का चन्द्रमा यौवन के उगते सूर्य के सामने फीका पड़ चुका है, व्रज के वह नवयुवराज मेरी अभीष्ट कामना पूर्ण करें!
जो अपने पिता के असीम हृदय को निरन्तर मथते रहते हैं, जो मानो साक्षात् मातृ-स्नेह के पुंज से गढ़े गए हैं, जो व्रज के बड़ों की आँखों को उनकी अपनी-अपनी रुचि के अनुसार आनन्दित करने वाली अमृत की बाती हैं, व्रज के वह नवयुवराज मेरी अभीष्ट कामना पूर्ण करें!
जो सारे संसार में मुग्ध कर देने वाली सरलता की कला के परम आचार्य हैं, जो असीम बल के लिए एक भव्य विश्राम-भवन हैं, जो अपने अनुपम गुण-समूह से अपने सभी बन्धुजनों को आनन्द के रंग में रँग देते हैं, व्रज के वह नवयुवराज मेरी अभीष्ट कामना पूर्ण करें!
जो केवल अपनी धनुष-सी भौंहों के तनाव मात्र से युवतियों में ऐसी भावनाओं की लहरें जगा देते हैं, जो सैकड़ों कामदेव भी मुश्किल से उत्पन्न कर पाएँ, जो अपनी प्रिय सखाओं के लिए, जो मानो मछलियाँ हैं, साक्षात् जीवन का सागर हैं, व्रज के वह नवयुवराज मेरी अभीष्ट कामना पूर्ण करें!
जिनकी चितवन, अंकुश के समान, कामदेव के गजराज को क्रीड़ा के लिए उकसा देती है, जो राधा के हृदय-सरोवर की गहराइयों को मथ डालती है, जिनके चरण सदा प्रेम-रस के मधुमय अमृत का आस्वादन करने की क्रीड़ा में लगे रहते हैं, व्रज के वह नवयुवराज मेरी अभीष्ट कामना पूर्ण करें!
जिनका प्रेम-बन्धन, राधिका के साथ मिलन से कदम-कदम पर नए सिरे से पूर्ण होता हुआ, चक्रवाक युगल की प्रसिद्ध निष्ठा को भी फीका कर देता है, जो मधुर मिठास की अनन्त धाराओं का सागर हैं, व्रज के वह नवयुवराज मेरी अभीष्ट कामना पूर्ण करें!
जिनके मन का उन्मत्त गजराज, जिसे तीनों लोक भी वश में नहीं कर सकते, केवल राधा की गम्भीर तिरछी चितवनों की बाढ़ से ही थमता है, जिनका मुख आनन्दित विशाखा के ठिठोलीपूर्ण वचनों से मुस्करा उठता है, व्रज के वह नवयुवराज मेरी अभीष्ट कामना पूर्ण करें!
"देखो सखी, अभी भोर में भी तुम्हारी करधनी टेढ़ी बँधी है, जब तुम गुप्त रूप से मुझसे मिली थीं तो जल्दबाजी में बाँधी गई थी!" इस प्रकार उनके गुप्त मिलन का भेद खोलकर वे राधा को लजाकर लाल कर देते हैं, व्रज के वह नवयुवराज मेरी अभीष्ट कामना पूर्ण करें!
जो कोई भी प्रसन्न हृदय से यत्नपूर्वक व्रज के नवयुवराज की इस परम लीला के अष्टक का पाठ करता है, रस की ज्ञाता वृन्दारण्य की रानी, स्नेहपूर्वक प्रसन्न होकर, निश्चय ही उसका नाम अपनी घनिष्ठ सेविकाओं की सूची में अंकित कर लेती हैं।