पंच-तत्त्व
पंच-तत्त्व — कलियुग में भगवान के अवतरण के पाँच अचिन्त्य, परस्पर अभिन्न एवं भिन्न स्वरूप: श्री कृष्ण चैतन्य (स्वयं भगवान, अपने ही भक्त के रूप में प्रकट), श्री नित्यानन्द प्रभु (गुरु-तत्त्व के रूप में भगवान), श्री अद्वैत आचार्य (भक्त-अवतार के रूप में भगवान), श्री गदाधर पण्डित (भगवान की शक्ति) और श्री श्रीवास पण्डित (शुद्ध भक्त)। किसी भी गौड़ीय वैष्णव कीर्तन से पूर्व गाए जाने वाले पंच-तत्त्व मन्त्र में इन सबको एक साथ नमन किया जाता है।
5 जीवनियाँ

श्री चैतन्य महाप्रभु
स्वर्णिम अवतार, जिन्होंने संकीर्तन आन्दोलन का शुभारम्भ किया
18 फ़रवरी 1486 (फाल्गुन पूर्णिमा), चन्द्रग्रहण के समय – 14 जून 1534, 48 वर्ष की आयु में
18 लीला पृष्ठ
श्री नित्यानन्द प्रभु
पतित-पावन, पतितों के उद्धारक
लगभग 1474, माघ शुक्ल त्रयोदशी – लगभग 1540
9 लीला पृष्ठ
श्री अद्वैत आचार्य
वह भक्त जिनकी प्रार्थनाओं ने प्रभु को धरती पर बुलाया
1434, माघ शुक्ल सप्तमी – 1534 के बाद
5 लीला पृष्ठ
श्री गदाधर पण्डित
भगवान की अपनी ह्लादिनी शक्ति
लगभग 1486 – लगभग 1534, महाप्रभु के तुरन्त पश्चात्
5 लीला पृष्ठ
श्री श्रीवास ठाकुर
जिनके आँगन में संकीर्तन आन्दोलन का प्रारम्भ हुआ
लगभग 1450 – 1534 के बाद
4 लीला पृष्ठ