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गोपीनाथ पट्टनायक

गोपीनाथ पट्टनायक की मुक्ति

राजस्व में हुई एक कमी ने किस प्रकार गोपीनाथ पट्टनायक को तलवारों से भरे मंच पर पहुँचा दिया, और उन्हें बचाने के लिए वास्तव में क्या करना पड़ा।

जगन्नाथ पुरी, महाराज प्रतापरुद्र के शासनकाल में, जैसा श्री चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य-लीला, अध्याय नौ में वर्णित है

एक भक्त को गले लगाते श्री चैतन्य महाप्रभु का भक्तिमय चित्र (स्रोत पृष्ठ पर कैप्शन में इस भक्त को रामानन्द राय बताया गया है)।
एक भक्त को गले लगाते श्री चैतन्य महाप्रभु का भक्तिमय चित्र (स्रोत पृष्ठ पर कैप्शन में इस भक्त को रामानन्द राय बताया गया है)।Gaudiya History (ISKCON Desire Tree) · ISKCON/BBT-affiliated devotional art, approved for use on this site
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श्री चैतन्य-चरितामृत के अपने वर्णन के अनुसार, यह संकट एक न चुकाए गए कर्ज़ और क्रोध के एक क्षण से शुरू हुआ। मलाजथ्य दण्डपाट के तहसीलदार गोपीनाथ पट्टनायक के हिसाब में गजपति राजकोष के दो लाख कहन कौड़ियाँ कम पड़ गईं। वे यह राशि नकद नहीं चुका सकते थे, इसलिए उन्होंने इसके बदले बारह उत्तम घोड़े देने का प्रस्ताव रखा और उन्हें महल में ले आए। घोड़ों का मूल्य आँकने के लिए एक राजकुमार भेजा गया। ग्रन्थ बताता है कि उसे गर्दन तानकर आकाश की ओर देखते रहने की एक विचित्र आदत थी। इस राजकुमार ने जानबूझकर घोड़ों का मूल्य बहुत कम लगाया। ठगे जाने पर क्रोधित होकर गोपीनाथ ने तीखा उत्तर दिया कि उनके घोड़े कम से कम राजकुमार की तरह बार-बार आकाश की ओर नहीं ताकते। यह एक चुभता हुआ व्यंग्य था, और इसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। अपमानित राजकुमार सीधे राजा के पास गया और बलपूर्वक धन वसूलने की अनुमति ले ली। उसने गोपीनाथ को चांगे पर चढ़वा दिया। यह एक मंच था, जिसके नीचे तलवारें गड़ी थीं। इसे इस तरह बनाया गया था कि दण्ड पाए व्यक्ति को नीचे तलवारों पर फेंक दिया जाए। उसी समय उनके छोटे भाई नायक वाणीनाथ और घर के बाकी लोग भी बन्दी बना लिए गए।

महाप्रभु का विचित्र, क्रोधपूर्ण इनकार #

भक्त दौड़कर श्री चैतन्य महाप्रभु को यह समाचार देने पहुँचे। उन्हें आशा थी कि प्रभु उस परिवार के लिए तुरन्त कुछ करेंगे, जिसे उन्होंने स्वयं अपने प्रिय भक्त कहा था। लेकिन इसके बदले उन्हें फटकार मिली। "गोपीनाथ पट्टनायक राजा को देय धन नहीं देना चाहते," महाप्रभु ने कहा। "तो फिर उसे दंड देने में राजा का दोष कैसे माना जाए?" इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि गोपीनाथ ने सरकार की ओर से धन इकट्ठा किया और राजा से डरे बिना उसे अपने लिए गलत ढंग से नर्तकियों पर खर्च किया। जब खतरा और बढ़ा और भक्तों ने फिर प्रार्थना की, तो उन्होंने साफ़ कह दिया कि वे तो केवल एक भिखारी संन्यासी हैं। वे गोपीनाथ की ओर से राजा से दो लाख कहन कौड़ियों की भीख नहीं माँग सकते। यह अंश पढ़कर सचमुच आश्चर्य होता है, क्योंकि यह स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु की वाणी है। और ग्रन्थ उस समय उनके शब्दों को न नरम करता है, न उनकी कोई सफ़ाई देता है।

कौड़ियों की मुद्रा (कौड़ी) का एक मध्यकालीन ख़ज़ाना, उसी तरह का जो गोपीनाथ पट्टनायक के समय पूरे भारत में चलता था। इसी में वे दो लाख (200,000) काहन कौड़ियाँ भी आती हैं जो गजपति के राजकोष में उनसे कम पड़ गई थीं। यह ख़ज़ाना ओडिशा का नहीं, बल्कि गुजरात के वडनगर का है।
कौड़ियों की मुद्रा (कौड़ी) का एक मध्यकालीन ख़ज़ाना, उसी तरह का जो गोपीनाथ पट्टनायक के समय पूरे भारत में चलता था। इसी में वे दो लाख (200,000) काहन कौड़ियाँ भी आती हैं जो गजपति के राजकोष में उनसे कम पड़ गई थीं। यह ख़ज़ाना ओडिशा का नहीं, बल्कि गुजरात के वडनगर का है, पर यह उसी कौड़ी-मुद्रा व्यवस्था को दिखाता है।Wikimedia Commons · CC BY-SA 4.0

जिस बात ने उन्हें प्रसन्न किया #

पूरा प्रसंग एक छोटी-सी बात पर मुड़ता है, जो लगभग संयोग से सामने आती है। जब गोपीनाथ के लिए प्रार्थनाएँ चल ही रही थीं, तभी एक और सन्देशवाहक यह समाचार लेकर आया कि वाणीनाथ को भी बन्दी बना लिया गया है। इसी समय महाप्रभु का स्वर बदल गया। उन्होंने पूछा कि पकड़े जाते समय वाणीनाथ क्या कर रहे थे। उत्तर मिला कि वे निर्भय होकर लगातार हरे कृष्ण महामंत्र का जप कर रहे थे। वे अपनी अंगुलियों पर गिनती रखते थे और हर हज़ार नामों के बाद अपने शरीर पर एक चिह्न लगाते थे। श्री चैतन्य-चरितामृत कहता है कि यह सुनकर प्रभु बहुत प्रसन्न हुए। गोपीनाथ के संकट के समाचार से उन्हें ऐसी प्रसन्नता नहीं हुई थी। कृष्णदास कविराज गोस्वामी लगभग खुलकर बता देते हैं कि इस पूरे मामले में महाप्रभु की वास्तविक रुचि किस बात में थी। वह थी मृत्यु के भय में भी वाणीनाथ की अडिग भक्ति, न कि राजकोष वाले विवाद का परिणाम। आगे जो कुछ भी हुआ, उसे इसी दृष्टि से समझना चाहिए।

इस्कॉन वृन्दावन में श्री श्री गौर-निताई के विग्रह। स्रोत-पृष्ठ पर यह भक्तिमय चित्र गोपीनाथ की वैराग्य के लिए अन्तिम प्रार्थना के साथ लगाया गया है। यह उनकी अपनी कथा की किसी घटना का शाब्दिक चित्रण नहीं है।
इस्कॉन वृन्दावन में श्री श्री गौर-निताई के विग्रह। स्रोत-पृष्ठ पर यह भक्तिमय चित्र गोपीनाथ की वैराग्य के लिए अन्तिम प्रार्थना के साथ लगाया गया है। यह उनकी अपनी कथा की किसी घटना का शाब्दिक चित्रण नहीं है।Gaudiya History (ISKCON Desire Tree) / ISKCON Vrindavan · ISKCON/BBT-affiliated devotional photograph, approved for use on this site

काशी मिश्र की कूटनीति #

महाप्रभु का सबके सामने इनकार इस मामले का अन्त नहीं था। हरिचन्दन पात्र नाम के एक अधिकारी सीधे राजा प्रतापरुद्र के पास गए। उन्होंने सीधी व्यावहारिक भाषा में तर्क दिया कि कर्ज़दार को मार डालने से कर्ज़ वसूल नहीं होता। अच्छा यही होगा कि घोड़ों को उचित मूल्य पर ले लिया जाए और गोपीनाथ को बाकी राशि धीरे-धीरे चुकाने दी जाए। राजा को सचमुच आश्चर्य हुआ, और वे तुरन्त सहमत हो गए। उन्हें तो केवल धन चाहिए था, किसी की मृत्यु नहीं। गोपीनाथ को चांगे से उतार लिया गया। लेकिन महाप्रभु ने सुना कि इस मामले को लेकर कितने सन्देशवाहक पहले ही उनके एकान्त में बाधा डाल चुके हैं। उन्होंने काशी मिश्र से, जिन ब्राह्मण के घर में वे पुरी में रहते थे, कहा कि वे अलालनाथ चले जाना चाहते हैं। वे इस परिवार की धन-सम्बन्धी उलझनों से बार-बार परेशान नहीं होना चाहते थे। तब काशी मिश्र ने प्रभु के चरण पकड़कर उनसे विनती की, और इसी से पूरा प्रसंग मुड़ गया। उन्होंने कहा कि सनातन गोस्वामी ने प्रभु के लिए ही अपना मंत्री-पद छोड़ा था, और रघुनाथ दास गोस्वामी ने प्रभु के लिए ही अपने परिवार का धन त्यागा था। उन्होंने यह भी कहा कि गोपीनाथ से जो भी भूल हुई हो, वे एक निष्कपट आत्मा हैं, जो प्रभु से अपने लिए कुछ नहीं चाहते। काशी मिश्र के द्वारा महाप्रभु की अप्रसन्नता की बात राजा प्रतापरुद्र तक पहुँची। राजा सबसे अधिक यही चाहते थे कि महाप्रभु पुरी में ही रहें। इसलिए उन्होंने गोपीनाथ का पूरा कर्ज़ माफ़ कर दिया, उनका वेतन दुगुना कर दिया और उन्हें उनका पुराना पद लौटा दिया। उन्होंने सम्मान के चिह्न के रूप में एक रेशमी वस्त्र देकर गोपीनाथ को विदा किया। राजा ने यह ध्यान रखा कि महाप्रभु को यह न बताया जाए कि उन्होंने यह सब महाप्रभु पर उपकार के रूप में किया है।

मुझे ऐसी कृपा नहीं मिली #

भाग्य के इस पलटने के बाद गोपीनाथ ने जो किया, वही अपने ढंग से इस अध्याय की असली बात है। सिर पर राजा का रेशमी वस्त्र लिए हुए वे महाप्रभु के चरणों में गिर पड़े और पूरी घटना कह सुनाई। फिर उन्होंने उसे कम महत्त्व की बात मानकर एक ओर रख दिया। "ये आपके चरणकमलों के ध्यान का मुख्य फल नहीं हैं," उन्होंने कहा। "भौतिक ऐश्वर्य तो अत्यंत क्षणभंगुर है।" उन्होंने अपने भाइयों रामानन्द राय और वाणीनाथ की ओर संकेत किया। उन्होंने कहा कि प्रभु ने उन्हें इससे कहीं बड़ी वस्तु दी है: सांसारिक जीवन के मोह से पूरी मुक्ति। बिना किसी कड़वाहट के उन्होंने माना कि उन्हें स्वयं वह कृपा नहीं मिली। उन्होंने सीधे उसी की याचना की: "कृपया मुझ पर भी अपनी शुद्ध कृपा कीजिए, जिससे मैं भी विरक्त हो सकूँ। अब मुझे भौतिक भोग में कोई रुचि नहीं है।" महाप्रभु ने इस याचना को न सीधे स्वीकार किया, न अस्वीकार। उन्होंने पूछा कि यदि पाँचों भाई एक साथ संसार छोड़ दें, तो इतने बड़े परिवार का भरण-पोषण कौन करेगा? उन्होंने बताया कि पाँचों भाई चाहे सरकारी सेवा में रहें या पूरी तरह संन्यासी बन जाएँ, वे जन्म-जन्मान्तर तक उनके नित्य सेवक ही रहेंगे। साथ ही उन्होंने एक व्यावहारिक शर्त रखी: पहले राजा को जो देय है, वह चुका दो, और जो बचे उसे केवल धार्मिक कार्यों में ही खर्च करो, किसी पाप-कर्म में कभी नहीं। श्री चैतन्य-चरितामृत इस शिक्षा को उतना ही महत्त्व देता है, जितना उस नाटकीय मुक्ति को। श्रील प्रभुपाद ने बाद में अपने प्रचार में इस प्रसंग का फिर उल्लेख किया। उन्होंने इसे इस बात के प्रमाण के रूप में बताया कि कठिनाई में भक्त की सच्ची रक्षा कृष्ण की कृपा करती है, राजनीतिक प्रभाव नहीं।

इस लीला के शास्त्र प्रमाण

একদিন লোক আসি’ প্রভুরে নিবেদিল ।
গোপীনাথেরে ‘বড় জানা’ চাঙ্গে চড়াইল ॥

eka-dina loka āsi' prabhure nivedila
gopīnāthere 'baḍa jānā' cāṅge caḍāila

शब्दार्थ

eka-dina: one day; loka: people; āsi': coming; prabhure: to Sri Chaitanya Mahaprabhu; nivedila: informed; gopīnāthere: Gopinatha Pattanayaka; baḍa jānā: the eldest son of King Prataparudra; cāṅge caḍāila: raised him on the changa.

एक दिन लोग अचानक आकर श्री चैतन्य महाप्रभु को सूचित करने लगे, "गोपीनाथ पट्टनायक, भवानन्द राय के पुत्र, को बड़ा-जाना अर्थात् राजा के ज्येष्ठ पुत्र ने मृत्युदंड दे दिया है और उन्हें चांगे पर चढ़ा दिया है।"

तात्पर्य से: चांगा एक ऐसा उपकरण था जो दोषी को मार डालने के लिए बनाया गया था। इसमें एक ऊँचा मंच होता था जिस पर दोषी को खड़ा किया जाता था। उस मंच के नीचे स्थिर, सीधी खड़ी तलवारें गड़ी होती थीं।

Antya 9.13 Sri Chaitanya-charitamrita

इस श्लोक से पूरा प्रसंग आरम्भ होता है। इसका तात्पर्य यह भी समझाता है कि चांगा वास्तव में क्या था और गोपीनाथ मृत्यु के कितने निकट पहुँच गए थे।

রাজ-বিলাত্‌ সাধি’ খায়, নাহি রাজ-ভয় ।
দারী-নাটুয়ারে দিয়া করে নানা ব্যয় ॥

rāja-vilāt sādhi' khāya, nāhi rāja-bhaya
dārī-nāṭuyāre diyā kare nānā vyaya

शब्दार्थ

rāja-vilāt: money due the King; sādhi': collecting; khāya: he uses; nāhi rāja-bhaya: without fear of the King; dārī-nāṭuyāre: to dancing girls; diyā: giving; kare: makes; nānā: various; vyaya: expenditures.

गोपीनाथ पट्टनायक सरकार की ओर से धन एकत्र करने के पद पर हैं, किन्तु वे उसका दुरुपयोग करते हैं। राजा से बिना डरे, वे उसे नर्तकियाँ देखने में व्यय करते हैं।

Antya 9.32 Sri Chaitanya-charitamrita

यह श्लोक उस तीखी फटकार का भाग है, जो समाचार पहली बार आने पर महाप्रभु ने गोपीनाथ के विषय में दी थी और जिसमें कोई नरमी नहीं थी। यह दिखाता है कि आरम्भ में प्रभु ने राजा का पक्ष लिया, परिवार का नहीं।

শুনি’ মহাপ্রভু হইলা পরম আনন্দ ।
কে বুঝিতে পারে গৌরের কৃপা-ছন্দবন্ধ ॥

śuni' mahāprabhu ha-ilā parama ānanda
ke bujhite pāre gaurera kṛpā-chanda-bandha?

शब्दार्थ

śuni': hearing; mahāprabhu: Sri Chaitanya Mahaprabhu; ha-ilā: became; parama ānanda: very pleased; ke bujhite pāre: who can understand; gaurera: of Lord Sri Chaitanya Mahaprabhu; kṛpā-chanda-bandha: mercy upon His devotee.

यह सुनकर महाप्रभु अत्यंत प्रसन्न हुए। गौर की अपने भक्त पर की गई कृपा को कौन समझ सकता है?

Antya 9.58 Sri Chaitanya-charitamrita

यह श्लोक महाप्रभु की वास्तविक प्रतिक्रिया दिखाता है। यह प्रतिक्रिया गोपीनाथ के अपने संकट के समाचार पर नहीं, बल्कि यह सुनकर हुई कि वाणीनाथ बंदीगृह में निर्भय होकर जप कर रहे हैं। यही इस अध्याय का केंद्रबिंदु है।

প্রভু কহে, — “সন্ন্যাসী যবে হইবা পঞ্চজন ।
কুটুম্ব-বাহুল্য তোমার কে করে ভরণ ?”

prabhu kahe, — "sannyāsī yabe ha-ibā pañca-jana
kuṭumba-bāhulya tomāra ke kare bharaṇa?"

शब्दार्थ

prabhu kahe: Lord Sri Chaitanya Mahaprabhu said; sannyāsī: sannyasis; yabe: when; ha-ibā: will be; pañca-jana: five persons; kuṭumba-bāhulya: the many members of the family; tomāra: your; ke: who; kare bharaṇa: will maintain.

प्रभु ने कहा, "यदि तुम पाँचों संन्यासी बन जाओगे, तो तुम्हारे इतने बड़े परिवार का भरण-पोषण कौन करेगा?"

Antya 9.140 Sri Chaitanya-charitamrita

गोपीनाथ की वैराग्य की याचना का महाप्रभु का व्यावहारिक उत्तर, जिसके तुरंत बाद (अन्त्य 9.141) यह निर्देश आता है कि पाँचों भाई गृहस्थ रहें या संन्यासी, वे उनके नित्य सेवक ही बने रहेंगे।

কিন্তু তোমার স্মরণের নহে এই ‘মুখ্যফল’ ।
‘ফলাভাস’ এই, — যাতে ‘বিষয়’ চঞ্চল ॥

kintu tomāra smaraṇera nahe ei 'mukhya-phala'
'phalābhāsa' ei, — yāte 'viṣaya' cañcala

शब्दार्थ

kintu: but; tomāra: Your; smaraṇera: of remembrance; nahe: not; ei: this; mukhya-phala: chief result; phala-ābhāsa: a glimpse of the result; ei: this; yāte: because; viṣaya: material opulence; cañcala: flickering.

"हे प्रभु, ये आपके चरणकमलों के ध्यान का मुख्य फल नहीं हैं। भौतिक ऐश्वर्य तो अत्यंत क्षणभंगुर है। अतः यह तो केवल आपकी कृपा के फल की एक झलक मात्र है।

तात्पर्य से: जैसा श्रीमद्भागवतम् (धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र) में बताया गया है, चार प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक लाभों में सफलता भक्ति का वास्तविक फल नहीं है, वास्तविक फल तो कृष्ण के प्रति अपने सुप्त प्रेम का वास्तविक विकास है। श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से गोपीनाथ पट्टनायक यह समझ सके कि उन्हें प्राप्त भौतिक लाभ उनके चरणकमलों के ध्यान का अंतिम फल नहीं थे।

Antya 9.137 Sri Chaitanya-charitamrita

मुक्ति के बाद गोपीनाथ पट्टनायक के पहले शब्द। इसके ठीक बाद के दो श्लोकों (अन्त्य 9.138-139) में वे वैराग्य की याचना करते हैं। तात्पर्य में उद्धृत धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र (श्रीमद्भागवतम् 1.1.2) उनके इस कथन को शास्त्र का आधार देता है।

इस लीला पर श्रील प्रभुपाद

प्रभुपाद: चैतन्य महाप्रभु के उस भक्त को फाँसी दिए जाने का आदेश दिया गया था... प्रभुपाद: गोपीनाथ पट्टनायक... प्रभुपाद: सभी भक्त चैतन्य महाप्रभु के पास गए, यह सोचकर कि वे अवश्य ही राजा से क्षमा करवा देंगे। उन्होंने कभी सहमति नहीं दी। "मैं ऐसा नहीं कर सकता। यदि उसने कुछ गलत किया है, तो उसे..." निःसंदेह, वे चैतन्य महाप्रभु की कृपा से ही बचे और सुरक्षित रहे, किन्तु प्रभु ने कभी सहमति नहीं दी। ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो... केवल कृष्ण पर निर्भर रहो।

Vairagya, Salaries, and Political Etiquette: Conversation, 1977-04-28, Bombay

Nandgram Dham
सत्यापित शास्त्रीय
लेखक
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समीक्षक
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