बान्धिलो माया जे दिन हो'ते
"जिस दिन से माया ने मुझे अविद्या और मोह की रस्सियों से बाँध लिया, तभी से मैं अनेक जन्म लेकर माया के इस बन्दीगृह में भटकता रहा।
"मैं देवता, दानव, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट और कृमि बनकर स्वर्ग, पृथ्वी और नरक में भटकता रहा, और सदा नाशवान वस्तुओं की आशा में लगा रहा।
"मैं नहीं जानता किस पुण्य के प्रभाव से मुझे पवित्र नदिया में श्रीवास का पुत्र बनने का सौभाग्य मिला और मैं आपके चरणों के दर्शन व स्पर्श कर सका।
"हर बार मृत्यु के समय मैंने बड़ा कष्ट भोगा है, परन्तु इस बार आपके स्पर्श से परम सुख के साथ मैं जा रहा हूँ।
"हे हरि! यदि आपकी इच्छा से मुझे फिर जन्म लेना पड़े, तो मेरी यही प्रार्थना है कि आपके चरणों में मेरा प्रेम और भक्ति बनी रहे।"
तब बालक फिर चुप हो गया। महाप्रभु की यह लीला देखकर श्रीवास के परिवार के लोग शोक छोड़कर आनन्द में डूब गए।
भक्तिविनोद श्रीवास से यही प्रार्थना करते हैं: चैतन्य महाप्रभु की लीला की इस अमृत-धारा को बार-बार पीते हुए ही मेरा यह जीवन बीत जाए।