भामिनि पृच्छ न वारं वारम्
हे भामिनी, बार-बार मुझसे मत पूछो। हाय, ग्वालराज के इस राजकुमार को देखकर मेरा मन पूरी तरह मोहित हो जाता है।
मुझे तिरछी नज़र से देखकर उस चंचल ने ऊपर खिले एक ताज़े कमल को चूम लिया। इससे मैं विवश होकर कांप उठी, मेरा सारा शरीर थरथराने लगा।
उसने गोल फलों से झुकी हुई अनार की बेल पर अपना हाथ रख दिया। यह देखकर मेरा तेजस्वी सतीत्व और धैर्य का धन, दोनों ही पूरी तरह नष्ट हो गए।
कामदेव जैसी सनातन विनोद-क्रीड़ा वाले इसने अशोक-लता की एक कोमल कोंपल को दाँतों से काट लिया। यह देखकर, हाय, मैं बहुत देर तक अपने शरीर की सुध-बुध ही भूल बैठी।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रूप गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 4