Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

चौदिके महान्त मेलि करये कीर्तन केलि

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चौदिके महान्त मेलि करये कीर्तन-केलि सात सम्प्रदाय गाय गीत बाजे चतुर्दश खोल गगन भेदिल रोल देखि जगन्नाथ आनन्दित
अर्थ

चारों दिशाओं से महात्मागण एकत्र होकर कीर्तन की लीला का आनन्द लेते हैं। वे सब मिलकर अनेक गीत गाते हैं। चारों दिशाओं से चौदह खोलों की ध्वनि आकाश को भेदती हुई प्रतीत होती है। श्री जगन्नाथ को निहारते हुए सब लोग आनन्द से भर जाते हैं।

उनमत नित्यानन्द आचार्य अद्वैतचन्द्र पण्डित श्रीबास हरिदास ए सभारे सङ्गे करि माझे नाचे गौर-हरि भकत-मण्डल चारि-पाश
अर्थ

श्री नित्यानन्द, श्री अद्वैतचन्द्र आचार्य, श्रीवास पण्डित और हरिदास ठाकुर आनन्द से उन्मत्त हैं। भक्तों के मण्डल के मध्य श्री गौर-हरि नृत्य करते हैं।

हरि हरि बोल बोले पद-भरे मही दोले नयाने बहये जल-धार प्रेमेर तरङ्ग रङ्ग सुमेरु जिनिया अङ्ग ताहे अष्ट सात्त्विक बिकार
अर्थ

श्री गौर-हरि "हरि! हरिबोल!" का जाप करते हैं। उनके नृत्य करते चरणों से पृथ्वी काँप उठती है। उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बहती है। वे दिव्य प्रेम की तरंगों में क्रीड़ा करते हैं। उनका तेजस्वी शरीर स्वर्णिम सुमेरु पर्वत को भी परास्त कर देता है। वे आठ सात्त्विक भावों को प्रकट करते हैं।

भाबाबेशे गौर राय नाचिते नाचिते याय धीरे धीरे चले जगन्नाथ आनन्द बिस्मय मन देखि प्रेम-सङ्कीरतन निज परिकर-गण साथ
अर्थ

दिव्य भाव से भरकर श्री गौर चलते-चलते नाचते ही रहते हैं। धीरे-धीरे श्री जगन्नाथ अपने रथ में आगे बढ़ते हैं। श्री गौर-हरि को अपने निजी सहचरों के साथ प्रेम-कीर्तन की लीला का आनन्द लेते देख, प्रत्येक व्यक्ति का हृदय आनन्द और आश्चर्य से भर जाता है।

दूरे गेल दुख शोक प्रेमाय भासिल लोक स्थाबर जङ्गम पशु पाखी ये प्रेम-बिलास धाम यदु कहे अनुपाम ये देखिल से-इ तार साखी
अर्थ

दुख और शोक बहुत दूर भाग गए हैं। चर और अचर सभी प्राणी, पक्षी और पशु भी, दिव्य प्रेम के सागर में तैर रहे हैं। यदु दास कहते हैं, दिव्य प्रेम की ये लीलाएँ अनुपम हैं। जो कोई इन्हें देखेगा, वह इस सत्य की साक्षी देगा।