देव हरे भव कारुण्य शाली
हे प्रभु हरि, करुणा करो। मेरी उस सखी का हृदय तुम्हारे तीखे कटाक्ष-बाण से बिंधा है, उसका शरीर दुबला हो गया है, फिर भी वह किसी तरह जीवित है।
उसकी अचानक हुई बीमारी का कारण कोई नहीं जान पाया, यद्यपि मंत्रों और औषधियों के ढेर लगा दिए गए। उसका पूरा परिवार उसके लिए शोक कर रहा है, निरंतर रोने से सबकी आँखें लाल हो गई हैं।
उसके हृदय में उठते घने, तीव्र ज्वर से वक्ष पर पड़े चमकते मोती चटक रहे हैं, उसका शरीर ठंडी भूमि पर निश्चल पड़ा है, अब वह बिना किसी उपाय के असहाय होकर डूबती जा रही है।
हे माधव, तुम जो गोकुलवासियों को निर्भयता प्रदान करने वाले उस महायज्ञ के व्रत में दीक्षित हो, हाय, हे सनातन, इतने गुणों से भरी तुम्हारी यह बालिका ऐसी भयंकर दशा भोगने की भला कैसे पात्र हो सकती है?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रूप गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 4