दुर्लभ मानब जन्म
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7 रिकॉर्डिंगदुर्लभ मानव-जन्म पाकर भी इस संसार में मैंने कृष्ण की भक्ति नहीं की, अपना यह दुख अब किसे कहूँ?
गृहस्थी, गृहस्थी करते-करते मेरा समय व्यर्थ बीत गया, मुझे कुछ लाभ नहीं हुआ, बस झंझट ही झंझट मिला।
यह कैसा संसार है, यह तो जादूगर के खेल के समान है। इसमें ममता करते-करते मेरे दिन व्यर्थ बीत रहे हैं।
जब यह शरीर गिर जाएगा, तब मेरा क्या रह जाएगा? न पुत्र, न परिवार, कोई भी मुझे सुख नहीं देगा।
मैं गधे के समान कठोर परिश्रम करता हूँ, यह सब किसके लिए करता हूँ? फिर भी मेरा भ्रम दूर नहीं होता।
मेरे दिन व्यर्थ काम में और रातें नींद के वश में बीत जाती हैं। मुझे यह ख़याल ही नहीं आता कि मृत्यु पास ही बैठी है।
अच्छा-बुरा जो मिलता है खाता हूँ, देखता हूँ, पहनता हूँ, बिना किसी चिंता के। मुझे यह पता ही नहीं कि किसी दिन यह शरीर छूट जाएगा।
शरीर, घर, पत्नी आदि की चिंता निरंतर मेरे हृदय में जागती रहती है, जिसने मेरी बुद्धि को नष्ट कर दिया है।
हाय, हाय! मैंने यह सोचा ही नहीं कि यह सब अनित्य है। जीवन समाप्त होने पर मेरा यह वैभव कहाँ रह जाएगा?
श्मशान में मेरा यह शरीर पड़ा रहेगा, और पक्षी-कीड़े उस पर अपनी क्रीड़ा करेंगे।
कुत्ते और गीदड़ सब आनंदित होकर मेरे इस शरीर को लेकर महोत्सव मनाएँगे।
जो गति इस शरीर की है, वही गति मेरे संसार के वैभव और सभी मित्रों-परिजनों की भी होगी।
इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति माया के इस मोह को त्यागकर नित्य सत्य कृष्ण की भक्ति की साधना करता है।
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री, इस्कॉन भक्त। सभी भक्त गायकों की जय।