एक् बार् भाबो मने
एक बार अपने हृदय में विचार करो। सांसारिक इच्छाओं के वशीभूत होकर इस जीवन में भटकते हुए, तुम्हें क्या सुख मिलता है? तुम कौन हो? तुम कहाँ से आए हो? तुम यहाँ कैसे आए? तुम यहाँ से कैसे जाओगे? जब यह शरीर गिर जाएगा, तब तुम कहाँ जाओगे?
तुम सुख, दुःख, भय, तुच्छ जय-पराजय, क्रोध, हिंसा और दूसरों के प्रति द्वेष का अनुभव क्यों करते हो? ये सब 'मैं' और 'मेरा' के भौतिक भाव से उत्पन्न होते हैं। भक्तिविनोद कहते हैं: गौरांग के चरणों की शरण लो और राधा-कृष्ण के नाम गाते हुए दिव्य आनन्द-रस से भर जाओ।