Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

गौरामृत अनुक्षण साधु महान्त मेघ गण

गौरामृत अनुक्षण साधु महान्त मेघ-गण बिश्वोद्याने करे बरिषण ताते फले प्रेम-फल भक्त खाय निरन्तर तार प्रेमे जीये जगज्-जन
अर्थ

महान् साधु-संत रूपी मेघों का समूह हर क्षण इस जगत् रूपी उद्यान पर भगवान् गौर की लीलाओं के अमृत की वर्षा करता रहता है। इन वर्षाओं से प्रेम के फल उगते हैं। भक्त बार-बार उन फलों को खाते हैं। उन फलों को खाकर संसार के लोग प्रेम के आनन्द से जी उठते हैं।

चैतन्य-लीलामृत-पुर कृष्ण-लीला-कर्पूर दु-इ मिलि हय ये माधुर्य साधु-गुरु-प्रसादे ताते यार मनो-बान्धे से-इ जाने माधुर्य-प्राचुर्य
अर्थ

भगवान् चैतन्य की लीलाओं का अमृत और भगवान् कृष्ण की लीलाओं का कपूर, दोनों मिलकर बहुत बड़ी मधुरता बन जाते हैं। जिनके हृदय में गुरु और साधुओं की कृपा बसी है, वे ही उस अमृत की महान मधुरता को समझ सकते हैं।

से-इ लीलामृत बिने खाय यदि अन्न-पाने तबु भक्तेर दुर्बल जीबन यार एक बिनु पाने प्रफुल्लित तनु मने हासे गाय करये नर्तन
अर्थ

यदि कोई भक्त लीला के उस अमृत का स्वाद लिए बिना केवल अन्न खाता है और जल पीता है, तो उसका जीवन बहुत दुर्बल हो जाता है। किन्तु यदि वह उस अमृत की एक बूँद भी चख ले, तो उसका शरीर और मन आनन्द से खिल उठते हैं। तब वह नाचता है, गाता है और हँसता है।

ए अमृत कर पान याहा बिना नाहि आन चित्ते कर सु-दृढ बिश्वास ना पड कुतर्क-गर्ते अमेध्य कर्कशावर्ते याहाते पडिले सर्ब-नाश
अर्थ

यदि कोई केवल उसी अमृत को पिए, और कुछ नहीं, तो उसके हृदय का विश्वास बहुत दृढ़ हो जाएगा। वह कुतर्क के गड्ढे में नहीं गिरेगा। वह पापों के भयानक भँवर में नहीं गिरेगा। वह ऐसी विपत्ति में नहीं गिरेगा जिसमें सब कुछ नष्ट हो जाता है।

श्री चैतन्य नित्यानन्द अद्वैत आर भक्त-बृन्द आर यत स्रोत भक्त-गण तोमा सबार श्री-चरण शिरे करि भूषण याहा हैते अभीष्ट पूरण
अर्थ

हे इस गीत के श्रोताओ, श्री चैतन्य, श्री नित्यानन्द, श्री अद्वैत और उनके सब भक्तों के श्रीचरणों को अपने सिर का आभूषण बना लो। ऐसा करो तो तुम्हारी सब इच्छाएँ पूरी हो जाएँगी।

श्री-रूप श्री-सनातन रघुनाथ श्री-चरण शिरे धरि करि ताँर आश कृष्ण-लीलामृतान्वित चैतन्य चरितामृत गाय किछु दीन कृष्ण-दास
अर्थ

श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी और श्री रघुनाथ दास गोस्वामी के श्रीचरणों को अपने सिर पर धारण करो। तब तुम्हारी इच्छाएँ पूरी होंगी। इसी तरह दीन कृष्ण दास भगवान् कृष्ण की लीलाओं के अमृत और भगवान् चैतन्य की लीलाओं के अमृत में से कुछ का एक छोटा-सा गीत गाता है।

इस भजन के बारे में

रचयिता
कृष्ण दास
पद
6