देख दु इ भा इ गौर निता इ
देखो, गौर और निताई, दोनों भाई, विग्रह-सिंहासन पर बैठे हैं! जैसे रात में सूर्य आ जाए, वैसे ही वे दोनों दिव्य आकाश से उतरकर इस पृथ्वी पर आए हैं।
श्रीवास पण्डित अपने साथियों के साथ दोनों प्रभुओं को देखकर आनन्दित हैं। कितने ही घड़ों से सुगन्धित जल दोनों प्रभुओं के सिर पर ढाला जा रहा है।
शंख, घण्टे, घड़ियाल, बाँसुरियाँ, वीणाएँ, वंशियाँ, खोल और करताल बज रहे हैं। “जय! जय!” और “हरि! हरि!” का शोर मचा है। चारों दिशाओं में भक्त गा रहे हैं।
स्नान कराकर और नए वस्त्र पहनाकर दोनों प्रभुओं को सिंहासन पर बैठाया गया है। धूप, दीप और अर्घ्य के साथ दोनों प्रभुओं की पूजा की जाती है।
भोग अर्पित किए जाते हैं। अन्त में पान-सुपारी और चन्दन का लेप अर्पित किया जाता है। फूलों की माला चढ़ाकर और फिर आरती करके कृष्ण दास दोनों प्रभुओं को दण्डवत् प्रणाम करता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- कृष्ण दास
- पद
- 5