प्रेम सिन्धु गोरा राय निता इ तरङ्ग ताय
प्रभु गौर दिव्य प्रेम की एक बहती हुई नदी हैं, ऐसी नदी जिसमें प्रभु निताई लहरें हैं और चारों दिशाओं में बहती हवा कृपा है। अब उस नदी में प्रेम के भाव उमड़ते और गिरते हैं। अब संसार भारी कोलाहल के साथ ऊँची गर्जना करता है। अब हर व्यक्ति के जलते हुए कष्ट और प्यास तुरन्त नष्ट हो जाते हैं।
देखो! देखो! वे रहे दयामय प्रभु चैतन्य और निताई! चाँदनी में भक्त-हंस उस प्रेम की नदी से पी-पीकर पुकारते हैं। वे ऊँचे स्वर में गाते हैं। उनमें से कोई भी उस अमृत को पीने से वंचित नहीं रहता।
रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी उस नदी में गहरी डुबकी लगाते हैं। वे अनेक प्रकार के रत्नों का खजाना लेकर ऊपर आते हैं। उन रत्नों को वे यत्न से भक्ति की लताओं के सूत्र में पिरोकर मालाएँ बनाते हैं और उन मालाओं को पतित जीवों के गले में पहना देते हैं। उन जीवों के दुःखों की ज्वालाएँ शीघ्र ही बुझ जाएँगी, दूर चली जाएँगी।
उस अमृत के जल में कमलों का एक वन खिलता है, जो संकीर्तन की अमृतमयी लीलाओं से भरा है। उस वन की सुगन्ध से सारे लोक भर गए हैं। उस वन में जंगली भौंरे और खिले हुए फूल भक्त ही हैं। हाय! कृष्ण दास अब भी उस वन के अमृत से वंचित है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- कृष्ण दास
- पद
- 4