लीलामृत रस सार तार शत शत धार
भगवान कृष्ण की लीलाओं के सबसे मधुर अमृत की सैकड़ों-सैकड़ों उफनती नदियाँ दसों दिशाओं से बहकर भगवान चैतन्य की लीलाओं के नित्य सरोवर में आ मिलती हैं। हे भक्तों के मन-रूपी हंसो, कृपा करके उसी सरोवर की ओर उड़ चलो।
हे भक्तो, कृपा करके भगवान चैतन्य के विषय में मेरी बातें सुनिए। आप सब भगवान कृष्ण के सुन्दर चरणों को अपने शरीर का आभूषण बना लीजिए। यही मेरा आपसे निवेदन है।
हे भक्तों के मन-रूपी भौंरो, भगवान कृष्ण की भक्ति के सिद्धान्तों के खिले हुए कमल-वन का मधुर अमृत कृपा करके चखो। दिन-रात भगवान कृष्ण के प्रति दिव्य प्रेम के खिले हुए कमलों के वन में मँडराते रहो।
हे भक्तों के हंसो और चक्रवाक पक्षियो, उन कमल-वनों में अनेक प्रकार के विहार का आनन्द लो। भगवान कृष्ण की लीलाओं के कमल-नालों के बीच सदा बने रहो। वहाँ आनन्द लो।
हे भक्तों के हंसो और चक्रवाक पक्षियो, भगवान चैतन्य की लीलाओं के उस सरोवर पर जाओ। वहाँ सदा लीलाओं का आनन्द लो। तुम्हारे सारे दुःख टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे। तुम्हें परम सुख मिलेगा। कृष्ण दास पूरे विश्वास से ये बातें कहता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- कृष्ण दास
- पद
- 5