हरि हरि! कत दिने हेन दशा हब
हे हरि! कितने दिनों बाद मेरी ऐसी दशा होगी, कि श्री रस-मञ्जरी के संग तथा श्री मणि-मञ्जरी के भाव में रहकर, मैं श्री रूप-मञ्जरी का अनुगामी बन सकूँ?
परम शीतल वृन्दावन में रत्नों की एक सुन्दर वेदी है, और उस पर रत्नमय सिंहासन है। सोने जैसी कान्ति वाली राधा और नीली कान्ति वाले सुन्दर कृष्ण, दोनों को मैं उस पर बिठाऊँगा।
सखियों के आदेश पर मैं कब चामर डुलाऊँगा, और उनके चन्द्र-मुख में पान दूँगा? उन दोनों की शुद्ध प्रेम-कथा और प्रीति-रस सुनकर मैं सदा आनन्दित रहूँगा।
मल्लिका, मालती, यूथी आदि तरह-तरह के फूलों की माला गूँथकर मैं दोनों के गले में पहनाऊँगा। रस-लीला के बाद जब वे विश्राम करेंगे, तब मैं उनके चरणों के पास बैठकर उनके चरण दबाऊँगा।
राधा-कृष्ण मेरे प्राणनाथ हैं, जीवन-मरण में मेरी एकमात्र गति हैं। इसके अतिरिक्त मेरे मन में और कुछ नहीं है। हे श्री कृष्ण चैतन्य! हे स्वरूप! हे रूप! हे सनातन! नरोत्तम की यही एक विनती है।