हेदे हे! नागर बर शुन हे मूरलीधर
हे नागर-शिरोमणि! हे मुरलीधर, सुनो! मैं तुम्हारे चरणों में विनती करती हूँ। तुम्हारे चरणों के नख मणियों जैसे हैं, मानो चन्द्रमाओं की माला हो। वह माला मेरे गले में कितनी सुन्दर लगेगी!
जब तुम श्रीदाम और सुदाम के साथ आनन्दपूर्वक वन को जाते हो, तब मैं द्वार पर खड़ी होकर सोचती हूँ कि तुम्हारे संग चली जाऊँ। परन्तु मैं बड़ों से डरती हूँ, इसलिए मेरी आँखें बस तुम्हारी ओर ही लगी रह जाती हैं।
हे बंधु, जब मैं नए बादलों को देखती हूँ, तो मुझे तुम्हारी याद आ जाती है, और मैं अपने केश खुले छोड़ देती हूँ, बाँधती नहीं। रसोई में जाकर, हे बंधु, मैं तुम्हारे ही गुण गाती हूँ, और धुएँ का बहाना करके रो लेती हूँ।
तुम न मणि हो, न माणिक्य, कि मैं तुम्हें अपने आँचल के कोने में बाँध लूँ और तुम वहीं बने रहो। तुम फूल भी नहीं हो, कि मैं तुम्हें अपने केशों में सजा लूँ। हे गुण-निधि! यदि विधाता ने मुझे स्त्री न बनाया होता, तो मैं तुम्हें लेकर देश-देश में घूमती।
यदि मैं अगुरु या चन्दन होती, तो तुम्हारे अंगों पर लिपटी रहती, और तुम्हारे पसीने के साथ बहकर तुम्हारे लाल चरणों पर गिर पड़ती। मेरे मन की यह कैसी अभिलाषा है! मैं बौनी होकर भी चन्द्रमा को छूना चाहती हूँ। क्या विधाता कभी मेरी यह इच्छा पूरी करेंगे?
नरोत्तम दास कहते हैं: हे दयामय, सुनो! मुझसे अपनी दया मत हटाना। जिस दिन तुम्हारे ही भाव में डूबा हुआ यह शरीर नष्ट हो जाए, उस दिन मुझे अपने चरणों की शरण दे देना।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरोत्तम दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- प्रार्थना
- पद
- 6