हरि हरि! कि मोर करम गति मन्द
हे हरि, हे हरि! मेरे कर्मों की गति कितनी मंद है! मैंने व्रज में राधा-कृष्ण के चरणों की सेवा एक पल के लिए भी नहीं की, और राग के इस संबंध को कभी नहीं समझा।
स्वरूप दामोदर गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, रूप गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, गोपाल भट्ट गोस्वामी, भूगर्भ गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी और लोकनाथ गोस्वामी, इन सबके चरण-कमल की सेवा मैंने एक पल के लिए भी नहीं की। तो फिर मेरी यह इच्छा कैसे पूर्ण होगी?
भक्तों में कृष्णदास कविराज रस के बड़े रसिक हैं, जिन्होंने चैतन्य-चरित लिखा। गौर और गोविन्द की लीला सुनकर पत्थर भी पिघल जाते हैं, फिर भी मेरा मन उसमें नहीं डूबा।
उन महापुरुषों के साथ रहने वाले भक्तों की संगति भी मैंने कभी नहीं की। मेरी यह कैसी दुःखभरी कथा है। मैंने अपना जीवन व्यर्थ बिता दिया। धिक्, धिक् इस नरोत्तम दास को!