हरि कुसुम स्तवकम्
मैं हरि की महिमा गाता हूँ, जिनकी चाल मतवाले हाथी के गर्व को भी लजा देती है, जिनके दाँत सुगन्धित कुन्द-कली की सुन्दरता को भी मात देते हैं, जिनका तेज असंख्य कामदेवों के रूप के अहंकार को चूर कर देता है, और जिनका मनोहर मुख मुसकान की सुन्दर मंजरी से खिला रहता है।
जिनकी बाँसुरी जब बोल उठती है तो युवतियों का मन हर लेती है, जिनके कमल-नयन प्रेम के उल्लास में नाचते हैं, जो ऐसी लीला में रत रहते हैं जिससे दिव्य रस की धारा और बढ़ती है, और जो जीवन के परम लक्ष्य में लगे लोगों के सच्चे आश्रय हैं।
जो अपने चरण-चिह्नों से यमुना के तट को सुशोभित करते हैं, जिनके सुन्दर चरणों की पूजा ब्रह्माण्ड के स्वामी भी करते हैं, जिनका कोमल कण्ठ लटकते हार से और दमकता है, और जो रुचक (गोरोचन) से बने तिलक से और भी मनोहर लगते हैं।
जिनकी शिखा पर लहराता हुआ मोरपंख सजा है, जिनकी भुजा ने पर्वतराज को उठाने का भार वहन किया, जिन्होंने सर्पराज के फन को ही अपना नृत्य-मंच बना लिया, और जिनका हृदय पर्वत की गुफाओं में विहार करने में आनन्द पाता है।
जो अपने कोमल-हृदय मित्रों को उत्सव का आनन्द देते हैं, जिनकी पावन लीला-कथाएँ कलि के प्रभाव को झाड़ फेंकती हैं, जिनकी भुजाओं में वह बल है जिसे सारा संसार जीत नहीं सकता, और जो बलराम और ग्वाल-बालकों के निकट रहते हैं।
जो साधु शुभचिन्तकों की इच्छाओं के लिए कल्पवृक्ष हैं, जो व्रज की युवतियों के लिए नये कामदेव हैं, जो अपनी शरण में आए सबकी रक्षा करने में सबसे कुशल हैं, और जो पाषाण-हृदय दुष्टों के समूह के लिए प्रचण्ड, धधकते सूर्य के समान हैं।
जिनके कमल-हाथ में एकत्रित पुष्प-गुच्छ सुशोभित है, जो बकासुर रूपी मतवाले गजराज के लिए सिंह के समान हैं, जिनकी कोमल बाँसुरी की तान हिरणियों के झुंड को भी मोहित कर लेती है, और जिनके कण्ठ का स्वर कोयल की कूक-सा उज्ज्वल है।
जिन्होंने युद्ध में दुष्ट राक्षसों को काट डाला, जो सब लोगों के लिए मंगलमय यश की लता के मूल स्रोत हैं, जो भवसागर के लिए कुम्भज अगस्त्य मुनि हैं (जिन्होंने समुद्र पी लिया था), जो स्वयं गुणों से परे हैं, और जिनके भक्त गुणों के संग से रहित हैं।
जो असंख्य दिव्य गुणों से देदीप्यमान हैं, जिनका सुन्दर मुख मुसकान की किरणों का मानो जुड़वाँ है, जो अहंकारी वृषासुर को चीर डालने वाले घन (हथौड़े) के समान हैं, और जिनका पूरा अस्तित्व ही तरह-तरह के चमकीले वेशों में की गई चंचल लीलाओं से बना है।
जो पूर्ण चन्द्र के समान मय-दानव के पुत्र व्योमासुर रूपी अन्धकार का नाश करने वाले हैं, जिन्होंने असुर राजाओं के सम्पूर्ण वंश को संकट में डाल दिया, अपने परिवार के उसी आनन्द-स्वरूप हरि को मैं यहाँ प्रणाम करता हूँ।
मैं हरि की वन्दना करता हूँ, जिनके वक्षस्थल पर स्वयं लक्ष्मी देदीप्यमान होकर विराजमान हैं, जो गुंजायमान भ्रमरों के निवास-स्थान जैसी माला से सुशोभित हैं, और जो स्त्रियों को परम मंगल प्रदान करने वाले उत्तम चन्दन-लेप के समान हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रूप गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 11