धन मोर नित्यानन्द
नित्यानन्द मेरा धन हैं। गौरचंद्र मेरे स्वामी हैं। युगल-किशोर मेरे प्राण हैं। अद्वैत आचार्य मेरा बल हैं। गदाधर मेरा कुल हैं। नरहरि मेरी शोभा हैं।
वैष्णवों के चरणों की धूल ही मेरा स्नान है। वैष्णवों के नाम का जप मेरा तर्पण है। भक्ति-रस के आस्वादन की दृष्टि से मन में सब शास्त्रों पर विचार करके मैंने निश्चय किया है कि श्रीमद्भागवत पुराण ही सब शास्त्रों में श्रेष्ठ है।
वैष्णवों के भोजन का शेष प्रसाद पाने में मेरे मन की दृढ़ निष्ठा है। वैष्णवों के नाम में मेरा आनंद है। वृन्दावन की भूमि ही वह घेरा है जिसमें मैं अपने मन को रखता हूँ। दीन नरोत्तम दास ऐसा कहते हैं।
इस भजन के बारे में
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- नरोत्तम दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री, इस्कॉन भक्त। सभी भक्त गायकों की जय।