कलहान्तरिता
हे सखी, मेरा अधीर हृदय व्यथा में डूबा जा रहा है, क्योंकि मैंने यहाँ गोकुल के वीर का आलिंगन नहीं किया।
मैंने अपनी परम प्रिय सखियों की सद्भावना से दी गई सलाह भी तनिक नहीं सुनी, न ही माधव के अपने सुलहकारी वचन ही सुने।
मैंने उसके भेंट किए भव्य हार की ओर देखा तक नहीं, न ही बार-बार मेरे सामने झुककर प्रणाम करते अपने प्रियतम की ओर।
हाय, जब वह मेरी ओर आ रहा था, तब मैंने अपने नित्य, अटल गुणों से युक्त प्रियतम को अपने वक्ष से क्यों न लगा लिया?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रूप गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 4