Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

कलि युगे श्री कृष्ण चैतन्य अबतार

कलि-युगे श्री कृष्ण चैतन्य अबतार खेलिबार प्रबन्धे कैल खोल करताल
अर्थ

कलियुग में श्री कृष्ण चैतन्य इस संसार में अवतरित हुए। उन्होंने खोल और करताल के साथ कीर्तन की लीलाएँ कीं।

गडागडि यान प्रभु निज सण्कीर्तने घरे घरे हरि-नाम देन सर्ब-जने
अर्थ

अपने ही नामों का कीर्तन करते हुए वे आनन्द में भूमि पर लोटते थे। घर-घर जाकर उन्होंने सभी लोगों को भगवान हरि के नाम का दान दिया।

उच्चैः-स्वरे कान्दे प्रभु जीबेर लागिया चेतन करान जीबे कृष्ण-नाम दिया
अर्थ

जीवों के कल्याण के लिए प्रभु प्रेम के आनन्द में ऊँचे स्वर से रोते थे। उन्हें भगवान कृष्ण के नामों का दान देकर उन्होंने जीवों में नई चेतना जगा दी।

छल छल करे आण्खि नयनेर जले जगत पबित्र कैल गौर-कलेबरे
अर्थ

उनकी आँखों से प्रेम के आँसू बह रहे थे। उनके दिव्य गौर शरीर ने सभी लोकों को पवित्र कर दिया।

झल झल मुख येन पूर्ण शशधर एमत त देखि ना-इ दयार सागर
अर्थ

उनका तेजस्वी मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान चमक रहा था। दया के ऐसे सागर को किसी ने पहले कभी नहीं देखा था।

टलमल करे अङ्ग भाबेते बिभोल ठमके ठमके चले बले हरिबोल
अर्थ

प्रेम के आवेश में उनका शरीर काँप रहा था। नाचते-नाचते चलते हुए वे “हरिबोल!” पुकार रहे थे।

डोरहि कौपीन क्षीण कटिर उपरे ढलिया ढलिया पडे गदाधेर क्रोडे
अर्थ

उनकी पतली कमर पर कौपीन टिकी हुई थी। चलते-चलते लड़खड़ाते हुए वे गदाधर के पास गिर पड़े।

आन परसङ्ग गोरा ना शुने श्रबणे तान मन गान रसे मजा-इया मन
अर्थ

भगवान गौरांग के कान भगवान कृष्ण के वर्णन के सिवा और कुछ नहीं सुनते थे। उनका मन भगवान कृष्ण की महिमा के गीतों के रस में डूबा हुआ था।

थिर नाहि हय प्रभुर नयनेर जल दीन-हीन जनेरे धरिया देय कोल
अर्थ

वे शान्त नहीं रह पाते थे। भगवान गौरांग की आँखों से प्रेम के आँसू बहते थे। प्रभु दीन-हीन पतित जीवों को हृदय से लगा लेते थे।

धेयांइया पूरब पिरीति परसङ्ग ना जानि काहार भाबे ह-इया त्रि-भङ्ग
अर्थ

वे अपने पार्षदों के साथ पहले की हुई प्रेममयी लीलाओं का ध्यान कर रहे थे, वे लीलाएँ जो उन्होंने भगवान कृष्ण के रूप में की थीं। उनके सामने त्रिभंग रूप में खड़ा वह व्यक्ति कौन था? वे यह नहीं जानते थे।

प्रेम-रसे भासा-इया अखिल संसार फुटिल श्री-बृन्दाबन सुरधुनी धार
अर्थ

उन्होंने सारे संसार को प्रेम-रस में तैरा दिया। गंगा के तट पर उन्होंने श्री वृन्दावन के सुन्दर दिव्य धाम को प्रकट किया।

ब्रह्मा महेश्वर यारे करे अन्वेषण भाबिया ना पान यांरे सहस्र-लोचन
अर्थ

ब्रह्मा, शिव और सभी देवता उन्हें खोजते हैं। हज़ार नेत्रों वाले इन्द्र उनका ध्यान करते हैं, फिर भी उन्हें पा नहीं पाते।

मत्त मातङ्ग गति मधुर मृदु हास यशोमति माता यांर भुबने प्रकाश
अर्थ

उनकी चाल मदमस्त हाथी जैसी सुन्दर थी। उनकी कोमल मुस्कान मधुर थी। उनके घर में माता यशोदा प्रकट थीं।

रतिपति जिनि रूप अति मनोहर लीला लाबण्य यार अति अनुपम
अर्थ

उनके मनोहर रूप ने कामदेव को जीत लिया था। उनका लावण्य और उनका लीला-भाव अनुपम था।

बसुदेब-सुत से-इ श्री-नन्द-नन्दन शचीर नन्दन एबे बले सर्ब-जन
अर्थ

सब लोग कहते हैं कि वसुदेव के पुत्र और नन्द के पुत्र रहे भगवान कृष्ण ही अब शची के पुत्र बने हैं।

चतुर्-भुज रूप हैल अत्य्-आश्चर्य-मय साबधान प्राण-नाथ गोरा रसमय
अर्थ

उन्होंने एक अद्भुत छह भुजाओं वाला रूप प्रकट किया। भगवान गौर अमृत के समान मधुर हैं। वे मेरे प्राणों के स्वामी हैं।

हरि हरि बल भा-इ कर महा-यज्ञ क्षिति-तले जन्मि केह ना हैय अबिज्ञ
अर्थ

हे मेरे भाइयो, “हरि! हरि!” बोलो। भगवान हरि के नामों के कीर्तन का महायज्ञ करो। अब सब लोग नाम-कीर्तन करते हैं, इसलिए पृथ्वी पर कोई भी अज्ञानी और मोहग्रस्त नहीं रहा।

ए चौत्रिश पदाबली ये करे कीर्तन दास नरोत्तम मागे ताहारे चरण
अर्थ

जो कोई इन चौंतीस पंक्तियों का कीर्तन करता है, नरोत्तम दास उसके चरणों में प्रार्थना करता है।

टिप्पणी: इस गीत की पंक्तियों के पहले अक्षर बंगला वर्णमाला के व्यंजनों के क्रम में हैं (क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह, क्ष)।

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पद
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