कलि युगे श्री कृष्ण चैतन्य अबतार
कलियुग में श्री कृष्ण चैतन्य इस संसार में अवतरित हुए। उन्होंने खोल और करताल के साथ कीर्तन की लीलाएँ कीं।
अपने ही नामों का कीर्तन करते हुए वे आनन्द में भूमि पर लोटते थे। घर-घर जाकर उन्होंने सभी लोगों को भगवान हरि के नाम का दान दिया।
जीवों के कल्याण के लिए प्रभु प्रेम के आनन्द में ऊँचे स्वर से रोते थे। उन्हें भगवान कृष्ण के नामों का दान देकर उन्होंने जीवों में नई चेतना जगा दी।
उनकी आँखों से प्रेम के आँसू बह रहे थे। उनके दिव्य गौर शरीर ने सभी लोकों को पवित्र कर दिया।
उनका तेजस्वी मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान चमक रहा था। दया के ऐसे सागर को किसी ने पहले कभी नहीं देखा था।
प्रेम के आवेश में उनका शरीर काँप रहा था। नाचते-नाचते चलते हुए वे “हरिबोल!” पुकार रहे थे।
उनकी पतली कमर पर कौपीन टिकी हुई थी। चलते-चलते लड़खड़ाते हुए वे गदाधर के पास गिर पड़े।
भगवान गौरांग के कान भगवान कृष्ण के वर्णन के सिवा और कुछ नहीं सुनते थे। उनका मन भगवान कृष्ण की महिमा के गीतों के रस में डूबा हुआ था।
वे शान्त नहीं रह पाते थे। भगवान गौरांग की आँखों से प्रेम के आँसू बहते थे। प्रभु दीन-हीन पतित जीवों को हृदय से लगा लेते थे।
वे अपने पार्षदों के साथ पहले की हुई प्रेममयी लीलाओं का ध्यान कर रहे थे, वे लीलाएँ जो उन्होंने भगवान कृष्ण के रूप में की थीं। उनके सामने त्रिभंग रूप में खड़ा वह व्यक्ति कौन था? वे यह नहीं जानते थे।
उन्होंने सारे संसार को प्रेम-रस में तैरा दिया। गंगा के तट पर उन्होंने श्री वृन्दावन के सुन्दर दिव्य धाम को प्रकट किया।
ब्रह्मा, शिव और सभी देवता उन्हें खोजते हैं। हज़ार नेत्रों वाले इन्द्र उनका ध्यान करते हैं, फिर भी उन्हें पा नहीं पाते।
उनकी चाल मदमस्त हाथी जैसी सुन्दर थी। उनकी कोमल मुस्कान मधुर थी। उनके घर में माता यशोदा प्रकट थीं।
उनके मनोहर रूप ने कामदेव को जीत लिया था। उनका लावण्य और उनका लीला-भाव अनुपम था।
सब लोग कहते हैं कि वसुदेव के पुत्र और नन्द के पुत्र रहे भगवान कृष्ण ही अब शची के पुत्र बने हैं।
उन्होंने एक अद्भुत छह भुजाओं वाला रूप प्रकट किया। भगवान गौर अमृत के समान मधुर हैं। वे मेरे प्राणों के स्वामी हैं।
हे मेरे भाइयो, “हरि! हरि!” बोलो। भगवान हरि के नामों के कीर्तन का महायज्ञ करो। अब सब लोग नाम-कीर्तन करते हैं, इसलिए पृथ्वी पर कोई भी अज्ञानी और मोहग्रस्त नहीं रहा।
जो कोई इन चौंतीस पंक्तियों का कीर्तन करता है, नरोत्तम दास उसके चरणों में प्रार्थना करता है।
टिप्पणी: इस गीत की पंक्तियों के पहले अक्षर बंगला वर्णमाला के व्यंजनों के क्रम में हैं (क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह, क्ष)।
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