Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi
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टेक्स्ट
कृष्ण-नाम धरे कोतो बल् विषय-वासनानले, मोर चित्त सदा ज्वले, रवि-तप्त मरु-भूमि-सम् कर्न-रन्ध्र-पथ दिया, हृदि माझे प्रवेशिया, वरिषोय सुधा अनुपम्
अर्थ

कृष्ण के नाम में कितनी शक्ति है? मेरा हृदय संसार-वासना की अग्नि में सदा जलता रहता है, जैसे सूर्य से तपा हुआ मरुस्थल। वह पवित्र नाम मेरे कानों के द्वारा हृदय में प्रवेश करके मेरी आत्मा पर अनुपम अमृत की वर्षा करता है।

हृदोय होइते बोले, जिह्वार अग्रेते चले, शब्द-रूपे नाचे अनुक्षन् कन्ठे मोर भङ्गे स्वर, अङ्ग काँपे थर थर, स्थिर होइते ना पारे चरण्
अर्थ

वह नाम मेरे हृदय से बोलता है, मेरी जीभ की नोक पर आ जाता है और वहाँ दिव्य ध्वनि के रूप में निरंतर नाचता रहता है। मेरा गला रुँध जाता है, मेरा शरीर थर-थर काँपने लगता है और मेरे पैर स्थिर नहीं रह पाते।

चक्षे धारा, देहे घर्म, पुलकित सब चर्म, विवर्न होइलो कलेवर मूर्छित होइलो मन्, प्रलयेर आगमन्, भावे सर्व-देह जर जर
अर्थ

मेरी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगती है, शरीर से पसीना निकलता है, पूरे शरीर में रोमांच हो जाता है और शरीर का रंग फीका पड़ जाता है। मन मूर्छित हो जाता है, जैसे मृत्यु निकट आ गई हो, और भाव से सारा शरीर जर्जर हो जाता है।

कोरि' एतो उपद्रव, चित्ते वर्षे सुधा-द्रव, मोरे डारे प्रेमेर सागरे किछु ना बुझिते दिलो, मोरे तो’ बातुल कोइलो, मोर चित्त-वित्त सब हरे
अर्थ

ऐसी अद्भुत हलचल मचाकर वह पवित्र नाम मेरे हृदय में अमृत की धारा बहाता है और मुझे प्रेम के सागर में डुबा देता है। वह मुझे कुछ भी समझने नहीं देता, उसने मुझे सचमुच पागल बना दिया है और मेरा सारा चित्त और धन चुरा लिया है।

लोइनु आश्रोय जा’र्, हेनो व्यवहार ता’र्, वर्निते ना पारि ए सकल् कृष्ण-नाम इच्छा-मोय्, जाहे जाहे सुखी होय्, सेइ मोर सुखेर सम्बल्
अर्थ

जिनकी मैंने शरण ली है, उनका व्यवहार ऐसा ही है। मैं यह सब वर्णन नहीं कर सकता। कृष्ण का नाम स्वतंत्र है और अपनी ही इच्छा से चलता है। जिस बात से वह सुखी हो, वही मेरे सुख का साधन है।

प्रेमेर कलिका नाम्, अद्भुत रसेर धाम्, हेनो बल करये प्रकाश् ईषत् विकशि’ पुनः, देखाय् निज-रूप-गुन, चित्त हरि’ लोय कृष्ण-पाश्
अर्थ

वह नाम प्रेम की कली और अद्भुत रस का धाम है। उसकी शक्ति ऐसी है कि थोड़ा-सा भी प्रकट होकर वह अपने ही स्वरूप और गुणों को दिखा देता है, मेरा चित्त हर लेता है और उसे कृष्ण के समीप ले जाता है।

पूर्न विकशित होइया, ब्रजे मोरे जाय लोइया, देखाय् मोरे स्वरूप-विलास् मोरे सिद्ध-देह दिया, कृष्ण-पाशे राखे गिया, ए देहेर कोरे सर्व-नाश्
अर्थ

पूर्ण रूप से प्रकट होकर वह नाम मुझे व्रज में ले जाता है और अपनी दिव्य लीलाओं का दर्शन कराता है। वह मुझे मेरा अपना सिद्ध देह प्रदान करता है, मुझे कृष्ण के निकट रखता है और इस नाशवान शरीर का सर्वथा नाश कर देता है।

कृष्ण-नाम-चिन्तामणि, अखिल रसेर खनि, नित्य-मुक्त शुद्ध-रस-मोय् नामेर बालाइ जत, सब लो’ये होइ हत, तबे मोर सुखेर उदोय्
अर्थ

कृष्ण का नाम चिन्तामणि है, समस्त दिव्य रसों की खान है, नित्य मुक्त और शुद्ध रस से पूर्ण है। जब नाम में आने वाली सभी बाधाएँ दूर होकर नष्ट हो जाएँगी, तभी मेरे सुख का सच्चा उदय होगा।