Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

महाभाब चिन्तामणि उद्भाबित तनु खानि

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महाभाब-चिन्तामणि उद्भाबित-तनु-खानि सखी-पति-सज्जा प्रभाबती कारुण्य-तारुण्य आर लाबण्य-अमृत-धारा ताहे स्नाता लक्ष्मी-जयी सती
अर्थ

श्री राधा महाभाव की चिन्तामणि हैं; उनका स्वरूप स्वयं बहुमूल्य रत्नों की खान है। अपनी सखियों द्वारा सजाई-धजाई वे परम तेजोमयी दिखती हैं। करुणा, यौवन और कान्ति की अमृत-धाराओं में स्नान करती हुई वे साध्वी राधा लक्ष्मी देवी को भी पीछे छोड़ देती हैं।

लज्जा पट्ट-बस्त्र जार सौन्दर्ज कुङ्कुम-सार कस्तुरी-चित्रित कलेबर कम्पाश्रु-पुलक-रङ्ग स्तम्भ-स्वेद-स्वर-भङ्ग जाड्योन्माद नब-रत्न-धर
अर्थ

उनकी लज्जा ही उनका रेशमी वस्त्र है, उनका सौन्दर्य ही उनका कुंकुम है, और उनका शरीर कस्तूरी से चित्रित है। उनके आभूषण प्रेम के स्वाभाविक भाव हैं: कम्पन, अश्रु, रोमांच, स्तम्भ, स्वेद, स्वरभंग, रक्ताभा, उन्माद और जड़ता। इस प्रकार उनका सम्पूर्ण शरीर इन नौ मणियों से अलंकृत है।

पञ्च-बिंशति-गुण फुल-माला सु-शोभन धीराधीरा भाब-पट्ट-बासा पिहित-मान-धम्मिल्ला सौभाग्य-तिलकोज्ज्वला कृष्ण-नाम-जशः-कर्णोल्लासा
अर्थ

उनके पच्चीस दिव्य गुण ही एक सुन्दर पुष्प-माला के समान उन्हें सुशोभित करते हैं। कृष्ण-प्रेम का धीर और अधीर भाव ही उनका वस्त्र है, जो कर्पूर से सुशोभित है; कृष्ण के प्रति उनका मान ही उनकी वेणी है, और सौभाग्य का तिलक उनके मस्तक पर चमक रहा है। श्रीकृष्ण के नाम और यश की ध्वनि ही उनके कानों का आभूषण और आनन्द है।

राग-ताम्बूलित-ओष्ठ कौटिल्य-कज्जल-स्पष्ट स्मित-कर्पूरित नर्म-शीला कीर्ति-जश-अन्तः-पुरे गर्ब-खट्टोपरि स्फुरे दुलित प्रेम-बैचित्त्य-माला
अर्थ

उनके अधर कृष्ण-प्रेम के पान से सदा लाल रहते हैं। उनकी आँखों का काजल कृष्ण के प्रति उनकी प्रेम भरी चतुराई है, और उनकी मधुर मुसकान और हँसी-ठिठोली ही वह कर्पूर है जिससे वे सुगन्धित रहती हैं। वे कीर्ति और यश के अन्तःपुर में गर्व की शय्या पर शोभा पाती हैं, और प्रेम-वैचित्त्य की माला उनके गले में झूलती रहती है।

प्राणय-रोष-कञ्चुली- पिहित स्तन-जुग्मका चन्द्रा-जयी कच्छपी-रबिनी सखी-द्वय-स्खन्दे लीला- कराम्बुजार्पण-शीला श्यामा श्यामामृत-बितरणी
अर्थ

प्रेम और मान से भरी चोली उनके वक्षस्थल को ढके रहती है। वे कच्छपी-वीणा बजाती हैं, जो उनकी प्रतिद्वन्द्वी चन्द्रावली को परास्त कर देती है। वे लीला से अपने कमल-सम हाथों को अपनी दो सखियों के कंधों पर टिकाए रहती हैं। वे सुन्दरी राधा श्यामसुन्दर के प्रेम-अमृत को बाँटने वाली हैं।

ए हेनो राधिका-पद तोमादेर सु-सम्पद दन्ते तृण जाचे तब पाय ए भक्तिबिनोद दीन राधा-दास्यामृत-कण रूप-रघुनाथ देहो ताय
अर्थ

श्री राधा के ऐसे चरण ही आपका सच्चा धन हैं। दाँतों में तिनका लेकर दीन भक्तिविनोद आपके चरणों में यह विनती करते हैं: 'हे रूप गोस्वामी, हे रघुनाथ दास गोस्वामी! मुझे श्री राधा की सेवा के अमृत की एक बूँद दे दीजिए।'