निखिल कला सम्पदि
हे प्रिय सखी! देखो, समस्त कलाओं की संपदा में निपुण, मुर-दैत्य को जीतने वाले श्रीकृष्ण नृत्य कर रहे हैं!
सजे हुए हल्लीसक-मण्डल के भीतर वे राधा को नचा रहे हैं, जिनके कुण्डल डोल रहे हैं।
वे बार-बार ताल के साथ नवपल्लव-से कोमल हाथ को हिलाते हैं, जिसके रत्नजटित कंगन झूल रहे हैं।
अपनी गति की मनोहर भंगिमाओं से उन्होंने चन्द्रमा को भी विवश कर दिया है; उन्होंने जितेन्द्रिय सनातन शंकर को भी स्तब्ध कर दिया है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रूप गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 4