ओहे प्रिय बन्धु-जन
हे प्रिय मित्रो, यदि आप अनन्त आनन्द चाहते हैं, तो कृपया मेरी विनती सुनिए। भौतिक वस्तुओं में सुख मत मानिए। जो दिव्य स्वरूप का है, उसे समझने का प्रयास कीजिए और उसी सार का आस्वादन कीजिए।
मदिरा पीने और मांस खाने में मिलने वाला सुख पूरी तरह दुःख ही है। यह सब केवल सुख का भ्रम है। इन्द्रियों से मिलने वाला आनन्द सुख जैसा लग सकता है, पर उसमें नित्य सुख नहीं मिलता।
आप चारों ओर से आशाओं में बँधकर और अपने अनर्थों का संग करते हुए निरन्तर क्यों भटकते रहते हैं? हमारी इच्छाओं का कोई अन्त नहीं, जैसे मृग सदा प्यासा ही रहता है। इसका एकमात्र फल दुःख का सागर होगा।
जब देह-रूपी वृक्ष से जीव-रूपी पक्षी उड़ जाएगा, तब इन्द्रियों के भोग किस काम आएँगे? उस समय चन्द्र, सूर्य, वायु और जल अपनी शक्ति भले दिखाएँ, पर वे आपको वापस नहीं बुला सकेंगे (क्योंकि आप उस देह-रूपी वृक्ष को छोड़कर जा चुके होंगे)।
(मृत्यु के समय) आपके प्रियजन करुण स्वर में रोएँगे और आपका मन भारी शोक और व्याकुलता से जलेगा। क्या ये सब आपको जगा पाएँगे? ऐसी महानिद्रा के जाल में पड़कर आप लोटते रहेंगे और अन्त में राख, कीड़े, मल आदि में बदल जाएँगे।
जिस देह के मोह में आप इतने देशों में भटके हैं, उसे अन्त में कुत्ते और सियार खाएँगे। आप इसकी कितनी ही देखभाल करें, काल के भयानक पंजे इस देह को कभी नहीं छोड़ेंगे। हाय!
इसलिए भटकना छोड़िए और परम लक्ष्य को पाने का प्रयास कीजिए। कृष्ण का भजन कीजिए और उनके चिन्तन में डूब जाइए। भौतिक आवरण और मन के विशाल विस्तार को भेदकर, आइए हम वृन्दावन चलें।
ग्वाले का वेश, मेघ जैसा श्याम वर्ण, तरुण, तेजस्वी और शान्त, वे एक सुन्दर कल्पवृक्ष के नीचे आश्रय लिए हुए हैं। उनकी अनुपम वंशी की ध्वनि सभी जीवों को उन्मत्त कर देती है। इस प्रकार श्याम हृदय के स्वामी हैं।
गायों जैसे जीव उन्हीं के हैं। उनका ऐश्वर्य अपार है, फिर भी उनका माधुर्य ही सबसे प्रधान है। कदम्ब वृक्ष के नीचे बैठे हुए, उनकी वंशी की शक्ति आनन्द से सबको खींचती है। वे साधकों के मन और हृदय को हर लेते हैं।
वैराग्य के द्वारा आप भौतिक वस्तुओं के प्रति अपनी सारी आसक्ति मिटा देंगे। सही ज्ञान से आप अज्ञान का नाश करेंगे। श्रवण और कीर्तन रूपी जल सींचने से प्रेम की अद्भुत लता प्रकट होगी।
यदि आप कृष्ण के निकट जाना चाहते हैं, तो सदा साधुओं का संग कीजिए और बुरी संगति से दूर रहिए। कृष्ण बहुत दूर नहीं हैं। यदि आप दिव्य प्रेम का अमृत पिएँ, तो कृष्ण आपके प्राण बन जाएँगे।
सब प्रकार के यज्ञ, होम, सकाम कर्म, अद्वैतवाद जैसे दर्शन और ज्ञान की नशीली मदिरा, इन सबको अपना शत्रु जानिए। जीव के रूप में आप कृष्ण के दास हैं। ज्ञान और कर्म आपकी बेड़ियाँ हैं, और केवल प्रेम ही आपका सच्चा धन है।
भौतिक देह, मन आदि आपके शत्रु हैं। इन सबको दृढ़ता से पैरों तले दबाकर रखिए! ध्यान रखिए कि वे विद्रोह करके कर्म, ज्ञान, योग और धर्म के बहाने आपको भौतिक भोग के क्षेत्र में न धकेल दें।
प्रेम के बल से उन्हें सेवा के अधीन रखिए। उन्हें कृष्ण-प्रेम से उपजे कार्यों में लगाइए, तब ये विरोधी आपके मित्र बन जाएँगे। वे आपको भौतिक विषयों से बाँध नहीं सकेंगे।
सदा “हरि! हरि!” बोलिए, मन को स्थिर कीजिए और अपना शरीर कृष्ण को समर्पित कीजिए। मन में दूसरे विचारों या इच्छाओं को बसने मत दीजिए। इसी प्रकार साधना कीजिए।
गहरी आन्तरिक व्याकुलता के साथ कृष्ण-तत्त्व को अपने मन में उतरने दीजिए। फिर अपने हृदय की गहराई में प्रवेश कीजिए। वहाँ उस दिव्य ज्ञान-मूर्ति के दर्शन कीजिए, जो वृन्दावन में दिव्य किशोर (नवीन-किशोर) के रूप में उल्लास से प्रकट होते हैं।
देह, मन, मित्र, घर, पालतू पशु, भोजन, धन, ये सब आपसे बहुत दूर हो जाएँगे। आप पूरी तरह पागल-से लगेंगे और बहुत-से लोग आप पर धूल फेंकेंगे, पर प्रेम का धन आपके पास रहेगा।
ब्रह्मा की सम्पत्ति और वैभव, अठारह योग-सिद्धियाँ, भोग और मुक्ति आदि सब तिनके जितने तुच्छ हो जाते हैं। प्रेम के प्रभाव से ये सब आपसे डरकर भाग जाएँगे।
हाय, जो धन आप पाएँगे, उसके आगे संसार की सारी भूमि का क्या मूल्य है? आप उन कृष्ण को पाएँगे, जो माधुर्य के मुकुटमणि हैं और बड़े-से-बड़े ऐश्वर्यवानों का भी ऐश्वर्य हैं।
आप दिव्य ज्ञान से युक्त जीव हैं, ऐसे क्षणिक सुख के लिए आप नहीं बने हैं। कृष्ण का आनन्द ही आपका सबसे प्रिय धन है। जीभ, आँखें, कान और नाक, सब आपकी प्यास बुझाने का प्रयास करते हैं, पर वे एक क्षण के लिए भी ऐसा नहीं कर पाते।
श्रीचैतन्य के चरणकमलों का आश्रय ही मेरा जीवन है। केदार कहते हैं, “भाइयो, कृपया सुनिए! वे ही वह कर्णधार हैं जो हमें जन्म-मृत्यु के इस संसार से पार कराएँगे। उनके सिवा और कोई नहीं है।”
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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