Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

ओहे प्रिय बन्धु-जन

ओहे प्रिय बन्धु-जन, शुन मोर निवेदन यदि चाह आनन्द अपार जडे सुख नाहि मान, चिदानन्द तत्त्व जान आस्वादन कर सेइ सार
अर्थ

हे प्रिय मित्रो, यदि आप अनन्त आनन्द चाहते हैं, तो कृपया मेरी विनती सुनिए। भौतिक वस्तुओं में सुख मत मानिए। जो दिव्य स्वरूप का है, उसे समझने का प्रयास कीजिए और उसी सार का आस्वादन कीजिए।

मद्य-मांस-खाद्य-सुख, सकलि जानह् दुःख सुख भ्रम मात्र सब हाय इन्द्रिय विलास यत, सकलि सुखेर मत किन्तु नित्य-सुख नाहि ताय
अर्थ

मदिरा पीने और मांस खाने में मिलने वाला सुख पूरी तरह दुःख ही है। यह सब केवल सुख का भ्रम है। इन्द्रियों से मिलने वाला आनन्द सुख जैसा लग सकता है, पर उसमें नित्य सुख नहीं मिलता।

आशापाशे बद्ध ह’ये, अनर्थेर सङ्ग ल’ये केन भ्रमितेच्छ निरन्तर आशार ना आच्छे शेष, मृग-तृष्णा अवशेष फल-मात्र दुःखेर सागर
अर्थ

आप चारों ओर से आशाओं में बँधकर और अपने अनर्थों का संग करते हुए निरन्तर क्यों भटकते रहते हैं? हमारी इच्छाओं का कोई अन्त नहीं, जैसे मृग सदा प्यासा ही रहता है। इसका एकमात्र फल दुःख का सागर होगा।

देह-रूप वृक्ष ह’ते, जीव-पक्षी अपगते इन्द्रियार्थ कि करिबे हाय चन्द्र, सूर्य, वायु, जल, प्रकाशिया स्वीय बल आमन्त्रिते नारिबे तोमाय
अर्थ

जब देह-रूपी वृक्ष से जीव-रूपी पक्षी उड़ जाएगा, तब इन्द्रियों के भोग किस काम आएँगे? उस समय चन्द्र, सूर्य, वायु और जल अपनी शक्ति भले दिखाएँ, पर वे आपको वापस नहीं बुला सकेंगे (क्योंकि आप उस देह-रूपी वृक्ष को छोड़कर जा चुके होंगे)।

प्रिय-जन कोलाहल, हा हुतास चिन्तानल जागाइते पारि कि तोमारे महानिन्द्रा-जाले पडि, याबे तुमि गडागडि भस्म, कीट-विष्टादि विकारे
अर्थ

(मृत्यु के समय) आपके प्रियजन करुण स्वर में रोएँगे और आपका मन भारी शोक और व्याकुलता से जलेगा। क्या ये सब आपको जगा पाएँगे? ऐसी महानिद्रा के जाल में पड़कर आप लोटते रहेंगे और अन्त में राख, कीड़े, मल आदि में बदल जाएँगे।

ये देहेर स्नेहे तुमि, भ्रमियाछ कत भूमि कुक्कुर, शृगाल ताहा खाय यतै यतन कर, कालेर कराल कर देह नाहि छाडे कभु हाय
अर्थ

जिस देह के मोह में आप इतने देशों में भटके हैं, उसे अन्त में कुत्ते और सियार खाएँगे। आप इसकी कितनी ही देखभाल करें, काल के भयानक पंजे इस देह को कभी नहीं छोड़ेंगे। हाय!

अतएव त्यजि भ्रम, परमार्थे कर श्रम भज कृष्ण चित्त-विनोदन भौतिकावरणान्तर, मनोरूपी सुविवर भेदि ताहा चल वृन्दावन
अर्थ

इसलिए भटकना छोड़िए और परम लक्ष्य को पाने का प्रयास कीजिए। कृष्ण का भजन कीजिए और उनके चिन्तन में डूब जाइए। भौतिक आवरण और मन के विशाल विस्तार को भेदकर, आइए हम वृन्दावन चलें।

गोप-वेश अभ्र-कान्ति, तरुण विशद शान्ति कल्पद्रुम आश्रित सुन्दर अपरूप वंषी-स्वरे, सर्व जिवे मत्त करे यथा श्याम हृदय-ईश्वर
अर्थ

ग्वाले का वेश, मेघ जैसा श्याम वर्ण, तरुण, तेजस्वी और शान्त, वे एक सुन्दर कल्पवृक्ष के नीचे आश्रय लिए हुए हैं। उनकी अनुपम वंशी की ध्वनि सभी जीवों को उन्मत्त कर देती है। इस प्रकार श्याम हृदय के स्वामी हैं।

जीव-वृन्द गाभी याँर, ऐश्वर्य अपार तार तबु ताय माधुर्य प्रधान पुलक-कदम्ब-तले, आकर्षण वंशी बले साधकेर हरे मनः प्राण
अर्थ

गायों जैसे जीव उन्हीं के हैं। उनका ऐश्वर्य अपार है, फिर भी उनका माधुर्य ही सबसे प्रधान है। कदम्ब वृक्ष के नीचे बैठे हुए, उनकी वंशी की शक्ति आनन्द से सबको खींचती है। वे साधकों के मन और हृदय को हर लेते हैं।

विषये आसक्ति यत, वैराग्ये करह हत सुष्ठु ज्ञाने तम कर नाश श्रवण-कीर्तन रूप, सिञ्चि जल अपरूप प्रेम-लता करह विकाश
अर्थ

वैराग्य के द्वारा आप भौतिक वस्तुओं के प्रति अपनी सारी आसक्ति मिटा देंगे। सही ज्ञान से आप अज्ञान का नाश करेंगे। श्रवण और कीर्तन रूपी जल सींचने से प्रेम की अद्भुत लता प्रकट होगी।

साधु-सङ्ग सदा कर, असत्-सङ्ग परिहर यदि या’बे कृष्ण सन्निधान कृष्ण अति दूरे नय, कृष्ण तव प्राण हय यदि प्रेम सुध कर पान
अर्थ

यदि आप कृष्ण के निकट जाना चाहते हैं, तो सदा साधुओं का संग कीजिए और बुरी संगति से दूर रहिए। कृष्ण बहुत दूर नहीं हैं। यदि आप दिव्य प्रेम का अमृत पिएँ, तो कृष्ण आपके प्राण बन जाएँगे।

यज्ञ, होम, कर्म सब, अद्वैतादि ज्ञानासव सकलि जानह वैरी तव तुमि जीव कृष्ण-दास, ज्ञान कर्म तव फाँस प्रेम-मात्र तोमार विभव
अर्थ

सब प्रकार के यज्ञ, होम, सकाम कर्म, अद्वैतवाद जैसे दर्शन और ज्ञान की नशीली मदिरा, इन सबको अपना शत्रु जानिए। जीव के रूप में आप कृष्ण के दास हैं। ज्ञान और कर्म आपकी बेड़ियाँ हैं, और केवल प्रेम ही आपका सच्चा धन है।

देह, मन आदि करि, आछे यत तव अरि सकले राखह पदतले येन ता’रा द्रोह-योगे, तोमाय ना फेले भोगे कर्म-ज्ञान-योग धर्म छले
अर्थ

भौतिक देह, मन आदि आपके शत्रु हैं। इन सबको दृढ़ता से पैरों तले दबाकर रखिए! ध्यान रखिए कि वे विद्रोह करके कर्म, ज्ञान, योग और धर्म के बहाने आपको भौतिक भोग के क्षेत्र में न धकेल दें।

से सकले प्रेम बले, राखह सेवार तले कृष्ण-प्रेम-जनक कर्मेते ता’हले विपक्ष-गण, ह’बे तव बन्धु-जन बान्धिते नारिबे विषयेते
अर्थ

प्रेम के बल से उन्हें सेवा के अधीन रखिए। उन्हें कृष्ण-प्रेम से उपजे कार्यों में लगाइए, तब ये विरोधी आपके मित्र बन जाएँगे। वे आपको भौतिक विषयों से बाँध नहीं सकेंगे।

सदा हरि हरि बल, चित्त कर अचञ्चल अङ्ग कर कृष्णे समर्पण अन्य चिन्त अन्य आशा, ना करे मनेते बासा एइरूप करह साधन
अर्थ

सदा “हरि! हरि!” बोलिए, मन को स्थिर कीजिए और अपना शरीर कृष्ण को समर्पित कीजिए। मन में दूसरे विचारों या इच्छाओं को बसने मत दीजिए। इसी प्रकार साधना कीजिए।

व्याकुल अन्तर ह’ये, कृष्ण तत्त्व छित्ते ल’ये प्रवेशह अन्तर दहरे देख तथा विद्या मूर्ति, वृन्दावने तार स्फूर्ति अप्राकृत नवीन किशोरे
अर्थ

गहरी आन्तरिक व्याकुलता के साथ कृष्ण-तत्त्व को अपने मन में उतरने दीजिए। फिर अपने हृदय की गहराई में प्रवेश कीजिए। वहाँ उस दिव्य ज्ञान-मूर्ति के दर्शन कीजिए, जो वृन्दावन में दिव्य किशोर (नवीन-किशोर) के रूप में उल्लास से प्रकट होते हैं।

देह, मन, बन्धु-जन, गृह पशु, खाद्य, धन सकलि सुदूरवर्ति ह’बे वातुल वातुल बलि, कत लोके देबे धूलि तुमि रबे प्रेमेर बिभवे
अर्थ

देह, मन, मित्र, घर, पालतू पशु, भोजन, धन, ये सब आपसे बहुत दूर हो जाएँगे। आप पूरी तरह पागल-से लगेंगे और बहुत-से लोग आप पर धूल फेंकेंगे, पर प्रेम का धन आपके पास रहेगा।

ब्रह्मार सम्पद धन, अष्टा-दश सिद्धिगण भुक्ति मुक्ति आदि करि यत तृणापेक्षा नीच ह’ये, पालावे तोमार भये प्रेमेर प्रभावे ह’ये हत
अर्थ

ब्रह्मा की सम्पत्ति और वैभव, अठारह योग-सिद्धियाँ, भोग और मुक्ति आदि सब तिनके जितने तुच्छ हो जाते हैं। प्रेम के प्रभाव से ये सब आपसे डरकर भाग जाएँगे।

ये धन पाइबे तुमि, तार आगे सर्व-भूमि किबा मूल्य धरे बल हाय ऐश्वर्य-गणेर जिनि, ऐश्वर्य माधुर्य मणि हेन कृष्ण लभिबे तोमाय
अर्थ

हाय, जो धन आप पाएँगे, उसके आगे संसार की सारी भूमि का क्या मूल्य है? आप उन कृष्ण को पाएँगे, जो माधुर्य के मुकुटमणि हैं और बड़े-से-बड़े ऐश्वर्यवानों का भी ऐश्वर्य हैं।

तुमि जीव ज्ञानमय, क्षुद्र सुख तव नय कृष्णानन्द तव प्रिय-धन जिह्वा चक्षु कर्ण नासा, तुषिते तव पिपासा समर्थ ना हय एकक्षण
अर्थ

आप दिव्य ज्ञान से युक्त जीव हैं, ऐसे क्षणिक सुख के लिए आप नहीं बने हैं। कृष्ण का आनन्द ही आपका सबसे प्रिय धन है। जीभ, आँखें, कान और नाक, सब आपकी प्यास बुझाने का प्रयास करते हैं, पर वे एक क्षण के लिए भी ऐसा नहीं कर पाते।

श्रि चैतन्य पदाश्रय, आमार जीवन हय केदार कहिछे शुन भाइ ए भव संसार पार, करिबारे कर्णधार तेँह विना आर केह नाइ
अर्थ

श्रीचैतन्य के चरणकमलों का आश्रय ही मेरा जीवन है। केदार कहते हैं, “भाइयो, कृपया सुनिए! वे ही वह कर्णधार हैं जो हमें जन्म-मृत्यु के इस संसार से पार कराएँगे। उनके सिवा और कोई नहीं है।”

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