प्रभु तब पद जुगे
हे प्रभु, मैं आपके चरणों में यह प्रार्थना रखता हूँ। मैं इस शरीर के सुख के लिए नहीं मांगता, न विद्या के लिए, न धन के लिए, न अनुयायियों के लिए।
मैं स्वर्गलोक के लिए भी नहीं मांगता। मैं निर्विशेष मुक्ति के लिए भी नहीं मांगता। मैं किसी प्रकार की शक्ति या ऐश्वर्य के लिए भी प्रार्थना नहीं करता।
अपने ही कर्मों के गुण-दोष के कारण मुझे जो भी जन्म मिले, मैं यही चाहता हूँ कि जन्म-जन्म में आपके नाम और गुणों का गान करता रहूँ।
मेरी एक ही इच्छा है, आपके चरणों के प्रति अहैतुकी भक्ति मेरे हृदय में प्रतिक्षण जागृत हो।
जैसा प्रेम अभी मुझे इन्द्रिय-विषयों से है, वैसा ही प्रेम आपके चरणों के प्रति भी हो जाए।
विपत्ति और सम्पत्ति दोनों में यह प्रेम समान बना रहे, और आपके नाम की शक्ति से यह प्रेम दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाए।
मैं चाहे पशु या पक्षी बन जाऊँ, चाहे स्वर्ग में रहूँ या नरक में, बस आपके प्रति भक्ति भक्तिविनोद के हृदय में सदा बनी रहे।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गीतावली
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- पद
- 7
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री, हरे कृष्ण मन्दिर, इस्कॉन भक्त। सभी भक्त गायकों की जय।