ओरे मन बारिबार आशा केनो कोरो
ओ मन! तू बार-बार आशाएँ क्यों बढ़ाता है? राजा चाहे जितनी भी उन्नति कर ले, अंत में उतना ही पतन भी होता है। शांत हो जा, और मेरी बात मान।
आशाओं का कोई अंत नहीं है। हे भाई, आशा का पथ सदा निराशा के काँटों से भरा रहता है। जितनी आशा बढ़ती है, उतनी ही और बढ़ती जाती है। आशा कभी मिटती नहीं, और वह यह विचार भी नहीं करती कि क्या नित्य है और क्या अनित्य।
आज एक राज्य पाओ, तो कल दूसरे राज्य की इच्छा होगी। यदि सारे राज्य मिल भी जाएँ, तो भी आशा समाप्त नहीं होगी। अंत में इंद्र का पद चाहोगे, और उसे भी छोड़कर ब्रह्मा के पद की महिमा चाहोगे।
हे भाई, फिर यह चिंता निरंतर बनी रहेगी कि 'ब्रह्मा का पद छोड़कर शिव का पद कैसे पाऊँ?' शिवत्व प्राप्त करने पर मनुष्य शंकराचार्य का अनुयायी बनकर ब्रह्म के समान होने की आशा करने लगता है।
इसलिए आशा के इस बंधन को, जो सर्वनाश का कारण है, अपने हृदय से दूर रखो। अकिंचन भाव अपनाकर, चैतन्य महाप्रभु के चरणों की शरण लेकर, सदा शांतिपुर में निवास करो।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- कल्याण-कल्पतरु
- भाव
- पद
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