Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

ओरे मन भुक्ति मुक्ति स्पृहा कोरो दूर

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ओरे मन भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा कोरो दूर भोगेर नाहिको शेष ताहे नाहि सुख-लेश निरानन्द ताहाते प्रचूर
अर्थ

ओ मन! भुक्ति और मुक्ति की इच्छा को दूर कर दो। भोग का कोई अंत नहीं है, और उसमें सुख की एक बूँद भी नहीं है, उसमें केवल दुःख ही भरा है।

इन्द्रिय-तर्पण बै भोगे आर सुख कै सेओ सुख अभाब-पूरण जे सुखेते आछे भोय ता'के सुख बोला नोय ता'के दुःख बोले बिज्ञ-जन
अर्थ

मैं कहता हूँ कि इंद्रियों की तृप्ति के अतिरिक्त भोग में और कोई सुख नहीं है, और वह भी केवल किसी कमी को भरने जैसा सुख है। जिस सुख में भय हो, उसे सुख नहीं कहते, बुद्धिमान लोग उसे दुःख कहते हैं।

शास्त्रे फल-श्रुति जत सेइ लोभे कोतो शत मूढ-जन भोग प्रति धाय से सब कैतब जानि' छारिया बैष्णब-ज्ञानी मुख्य-फल कृष्ण-रति पाय
अर्थ

शास्त्रों में बताए गए फलों को सुनकर, उनके लोभ में न जाने कितने सैकड़ों मूर्ख लोग भोग की ओर दौड़ते हैं। पर ज्ञानी वैष्णव इन सबको छलावा जानकर त्याग देता है, और कृष्ण-प्रेम रूपी मुख्य फल पाता है।

मुक्ति-बाञ्छा दुष्ट अति नष्ट कोरे' शिष्ट-मति मुक्ति-स्पृहा कैतब-प्रधान तह जे छारिते नरे माया नाहि छारे ता'रे ता'र जत्न नाहे फलबान
अर्थ

मुक्ति की इच्छा अत्यंत दुष्ट है, वह अच्छे विचारों को नष्ट कर देती है। मुक्ति की स्पृहा सबसे बड़ा छलावा है। जो व्यक्ति इस इच्छा को नहीं छोड़ पाता, माया भी उस व्यक्ति को नहीं छोड़ती, उसका सारा प्रयास निष्फल रहता है।

अत एब स्पृहा-द्वोय छारि' शोध ए हृदोय नाहि राखो कामेर बासना भोग-मोख नाहि चाइ श्री-कृष्ण-चरण पाइ बिनोदेर एइ तो' साधन
अर्थ

इसलिए इन दोनों इच्छाओं को त्यागकर इस हृदय को शुद्ध करो। इसमें काम की वासना मत रखो। मुझे भोग और मुक्ति नहीं चाहिए, मुझे तो केवल श्री कृष्ण के चरण चाहिए। यही भक्तिविनोद की साधना है।