ओरे मन भुक्ति मुक्ति स्पृहा कोरो दूर
ओ मन! भुक्ति और मुक्ति की इच्छा को दूर कर दो। भोग का कोई अंत नहीं है, और उसमें सुख की एक बूँद भी नहीं है, उसमें केवल दुःख ही भरा है।
मैं कहता हूँ कि इंद्रियों की तृप्ति के अतिरिक्त भोग में और कोई सुख नहीं है, और वह भी केवल किसी कमी को भरने जैसा सुख है। जिस सुख में भय हो, उसे सुख नहीं कहते, बुद्धिमान लोग उसे दुःख कहते हैं।
शास्त्रों में बताए गए फलों को सुनकर, उनके लोभ में न जाने कितने सैकड़ों मूर्ख लोग भोग की ओर दौड़ते हैं। पर ज्ञानी वैष्णव इन सबको छलावा जानकर त्याग देता है, और कृष्ण-प्रेम रूपी मुख्य फल पाता है।
मुक्ति की इच्छा अत्यंत दुष्ट है, वह अच्छे विचारों को नष्ट कर देती है। मुक्ति की स्पृहा सबसे बड़ा छलावा है। जो व्यक्ति इस इच्छा को नहीं छोड़ पाता, माया भी उस व्यक्ति को नहीं छोड़ती, उसका सारा प्रयास निष्फल रहता है।
इसलिए इन दोनों इच्छाओं को त्यागकर इस हृदय को शुद्ध करो। इसमें काम की वासना मत रखो। मुझे भोग और मुक्ति नहीं चाहिए, मुझे तो केवल श्री कृष्ण के चरण चाहिए। यही भक्तिविनोद की साधना है।