Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

ओरे मन क्लेश ताप देखि जे अशेष

ओरे मन क्लेश-ताप देखि जे अशेष अबिद्या अस्मिता आर अभिनिबेश दुर्बार राग द्वेष एइ पञ्च क्लेश
अर्थ

ओ मन! मुझे अनंत क्लेश दिखाई देते हैं। ये पाँच क्लेश हैं: अविद्या (अज्ञान), अस्मिता (मिथ्या अहंकार), दुर्निवार अभिनिवेश (सांसारिक वस्तुओं में डूबे रहना), राग (आसक्ति) और द्वेष (घृणा)।

अबिद्यात्मा-बिस्मरण अस्मितान्य-बिभाबन अभिनिबेशान्ये गाड-मति अन्ये प्रीति रागान्धता बिद्वेषात्मा बिशुद्धता पञ्च क्लेश सदाइ दुर्गति
अर्थ

परमात्मा को भूल जाने से अविद्या उत्पन्न होती है। परमात्मा से हटकर दूसरी वस्तुओं का चिंतन करने से अस्मिता उत्पन्न होती है। दूसरी वस्तुओं में मन को गहराई से लगाने से अभिनिवेश उत्पन्न होता है। दूसरी वस्तुओं के प्रेम में अंधे होने से राग उत्पन्न होता है, और आत्मशुद्धि के संघर्ष से द्वेष उत्पन्न होता है। ये पाँच क्लेश मुझे सदा सताते रहते हैं।

भुलिया बैकुण्ठ-तत्त्व माया-भोगे सु-प्रमत्त आमि आमि कोरिया बेदाइ ए आमार से आमार ए भाबना अनिबार ब्यस्त कोरे' मोर चित्त भाइ
अर्थ

वैकुण्ठ के सत्य को भूलकर मैं माया के भोग में उन्मत्त हो गया। 'मैं, मैं' करते हुए मैं घूमता रहा। 'यह मेरा है, वह भी मेरा है', यह विचार निरंतर बना रहा। हे भाइयों, इस प्रकार मेरा चित्त सदा व्याकुल रहा।

ए रोग-शमनोपाय अन्वेषिया हाय हाय मिले बैद्य सद्य जमोपम आमि ब्रह्म माया भ्रम एइ औषधेर क्रम देखि' चिन्ता होइलो बिषम
अर्थ

इस रोग को दूर करने का उपाय खोजते हुए, हाय, हाय! मुझे यमराज के समान एक वैद्य मिला। उसने कहा, 'मैं ही ब्रह्म हूँ, माया केवल भ्रम है', यही उस औषधि का क्रम था। इसे देखकर मेरी चिंता असहनीय हो गई।

एके तो' रोगेर कष्ट जमोपम बैद्य-भ्रष्ट ए जन्त्रण किसे जाय मोर श्री-चैतन्य दोयामोय कोरो जदि समाश्रोय पार हबे ए बिपद घोर
अर्थ

एक ओर रोग का कष्ट है, दूसरी ओर यमराज-सम यह पतित वैद्य है। मेरी यह पीड़ा कैसे दूर होगी? यदि मैं दयामय श्री चैतन्य की शरण ग्रहण करूँ, तो इस भयानक विपत्ति से अवश्य पार हो जाऊँगा।

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पद
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