Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

प्रेमे घूर्णित नयन पूर्णित (नित्यानन्दाष्टकम्)

प्रेमे घूर्णित, नयन पूर्णित, चञ्चल मृदु-गति-निन्दितं वदन-मण्डल, चाँद निरमल, वचन अमृत-खण्डितम् असीम गुण-गणे, तारिले जग-जने, मोहे काहे कुरु वञ्चितं जयति जय, वसु-जाह्नव-प्रिय, देहि मे स्व-पदान्तिकम्
अर्थ

प्रेम से उनके नेत्र घूम रहे हैं और आँसुओं से भरे हैं, और उनकी चंचल, कोमल चाल सबको लजा देती है। उनका मुखमण्डल निर्मल चन्द्रमा है और उनकी वाणी अमृत से भी मधुर है। अपने असीम गुणों से आपने जगत के लोगों को तार दिया, फिर मुझे क्यों वंचित रखा? हे वसुधा और जाह्नवा के प्रिय, आपकी जय हो, जय हो! मुझे अपने चरणों के निकट स्थान दीजिए।

मिहिर-मण्डल, श्रवणे-कुण्डल, गण्ड-मण्डले दोलितं किये निरुपम, मालतीर दाम, अङ्गे अनुपम-शोभितम् मधुर-मधु-मदे, मत्त मधुकर, चारु चौदिके चुम्बितं जयति जय, वसु-जाह्नव-प्रिय, देहि मे स्व-पदान्तिकम्
अर्थ

सूर्य-मण्डल जैसे उज्ज्वल कुण्डल उनके कपोलों पर झूलते हैं। मालती के फूलों की कैसी अनुपम माला उनके अंगों को अनुपम शोभा दे रही है! उसके मीठे मधु से मतवाले भौंरे चारों ओर उसे चूमते हैं। हे वसुधा और जाह्नवा के प्रिय, आपकी जय हो, जय हो! मुझे अपने चरणों के निकट स्थान दीजिए।

आजानुलम्बित, बाहु-सुवलित, मत्त-करिबर-निन्दितं भाया भाया बकि, गभीर डाक-इ, करु दश-दिक भेदितम् अमर किन्नर, नाग-नर-लोक, सर्व-चित्त सुदर्शितं जयति जय, वसु-जाह्नव-प्रिय, देहि मे स्व-पदान्तिकम्
अर्थ

उनकी सुडौल भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं और मतवाले हाथी की सूँड़ को भी लजाती हैं। "भैया! भैया!" कहकर वे गम्भीर स्वर में पुकारते हैं, जिससे दसों दिशाएँ गूँज उठती हैं। देवता, किन्नर, नाग और मनुष्य, सबके चित्त उन्हें देखकर मोहित हो जाते हैं। हे वसुधा और जाह्नवा के प्रिय, आपकी जय हो, जय हो! मुझे अपने चरणों के निकट स्थान दीजिए।

क्षणे हुहुङ्कृत, लम्फ झम्फ कृत, मेघ निन्दित-गर्जितं सिंह-डमरु, क्षीण कटितट, नील-पट्ट-वास-शोभितम् सो पँहु धुनी-तीरे, सघने धाब-इ, चरण भरे मही कम्पितं जयति जय, वसु-जाह्नव-प्रिय, देहि मे स्व-पदान्तिकम्
अर्थ

कभी वे "हुं!" की गर्जना करते हुए उछलते-कूदते हैं, और उनका गर्जन मेघों की गड़गड़ाहट को भी मात करता है। उनकी कमर सिंह और डमरू जैसी पतली है, और वे नीले रेशमी वस्त्र से शोभित हैं। वे प्रभु गंगा के तट पर तेज़ी से दौड़ते हैं, और उनके चरणों के भार से धरती काँप उठती है। हे वसुधा और जाह्नवा के प्रिय, आपकी जय हो, जय हो! मुझे अपने चरणों के निकट स्थान दीजिए।

अबनी-मण्डल, प्रेमे बादल, करल अवधौत धाबितं तापी दीन हीन, तार्किक दुर्ज्जन, केह ना भेल बञ्चितम् श्री-पद-पल्लव, मधुर-मधुरी, भजत भ्रमर-सुखपीतं जयति जय, वसु-जाह्नव-प्रिय, देहि मे स्व-पदान्तिकम्
अर्थ

अवधूत ने दौड़-दौड़कर सारी पृथ्वी को प्रेम से भर दिया। दुःखी, दीन, हीन, तार्किक और दुर्जन, कोई भी वंचित नहीं रहा। भक्त भौंरों की तरह उनके मधुर, कोमल चरण-पल्लवों का भजन करते हैं और उनका सुख पीते हैं। हे वसुधा और जाह्नवा के प्रिय, आपकी जय हो, जय हो! मुझे अपने चरणों के निकट स्थान दीजिए।

ओ मणि-मञ्जीर, चारु तरलित, मधुर मधुर सुनादितं अतुल रातुल, युगल पद-तल, अमल-कमल-सुराजितम् तेजिया अमर, अबनी हिमकर, निता-इ-पद-नख शोभितं जयति जय, वसु-जाह्नव-प्रिय, देहि मे स्व-पदान्तिकम्
अर्थ

उनके मणि-जड़ित नूपुर सुन्दरता से हिलते हैं और बहुत मधुर झंकार करते हैं। उनके दोनों तलवे अतुलनीय रूप से लाल हैं और निर्मल कमलों जैसे शोभा पाते हैं। स्वर्ग छोड़कर चन्द्रमा धरती पर उतर आया है और निताई के चरणों के नखों के रूप में चमक रहा है। हे वसुधा और जाह्नवा के प्रिय, आपकी जय हो, जय हो! मुझे अपने चरणों के निकट स्थान दीजिए।

याँहार भये, कलि-भुजग, भागल भेल सभे हर्षितं अपन-किरणे जनु, तिमिर नाश-इ, तैछे कमल-सुराजितम् दुरित-भये क्षिति, अबहि आतुर, भार तार करु नाशितं जयति जय, वसु-जाह्नव-प्रिय, देहि मे स्व-पदान्तिकम्
अर्थ

उनके भय से कलि-रूपी सर्प भाग गया और सब लोग हर्षित हो गए। जैसे सूर्य अपनी किरणों से अँधेरा मिटाकर कमल को खिला देता है, वैसे ही वे शोभा पाते हैं। पाप के भय से व्याकुल धरती का भार उन्होंने मिटा दिया। हे वसुधा और जाह्नवा के प्रिय, आपकी जय हो, जय हो! मुझे अपने चरणों के निकट स्थान दीजिए।

ईषत हस-इते, झलके दामिनी, कामिनी-गण मन मोहितं सो पाँहु धुनी-तीरे, ना जानि कार भावे, आबनी उपरे गिरितम् बचन बल-इते, अधर कम्प-इ, बाहु तुलि क्षणे रोदितं जयति जय, वसु-जाह्नव-प्रिय, देहि मे स्व-पदान्तिकम्
अर्थ

जब वे थोड़ा-सा मुस्कुराते हैं तो बिजली-सी चमक जाती है और रमणियों के मन मोहित हो जाते हैं। वे प्रभु गंगा के तट पर न जाने किस भाव में धरती पर गिर पड़ते हैं। बोलने का प्रयास करते ही उनके होंठ काँपने लगते हैं, और भुजाएँ उठाकर वे बार-बार रो पड़ते हैं। हे वसुधा और जाह्नवा के प्रिय, आपकी जय हो, जय हो! मुझे अपने चरणों के निकट स्थान दीजिए।

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पद
8