पुलके चरित गाय सुखे गडागडि याय
देखो रे, चैतन्य अवतार को देखो। वे चरित्र गाते हैं तो रोमांच से उनके रोएँ खड़े हो जाते हैं, और आनन्द में भरकर वे भूमि पर लोटने लगते हैं। वे वैकुण्ठ के नायक स्वयं भगवान् हरि हैं, जो ब्राह्मण के रूप में अवतरित होकर संकीर्तन में विहार करते हैं।
उनका श्रीविग्रह सुन्दर और शोभायमान है, उनकी कान्ति सोने को भी जीत लेती है और उनकी लम्बी भुजाएँ घुटनों तक पहुँचती हैं। संन्यासी का रूप धारण करके वे अपने ही रस के आस्वादन में विह्वल हैं, और किस सुख में वे नाच रहे हैं, यह मैं नहीं जानता।
हे श्रीगौरसुन्दर, हे करुणा के सागर, आपकी जय हो। हे वृन्दावन के राजा, आपकी जय हो। हे नवद्वीप के स्वामी, मुझ पापी वृन्दावन दास को अपने चरण-कमलों की छाया दीजिए।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वृन्दावन दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- पद
- 3