Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

श्री हरि वासरे हरि कीर्तन विधान

श्री हरि-वासरे हरि-कीर्तन-विधान नृत्य आरम्भिला प्रभु जगतेर प्राण
अर्थ

एकादशी के दिन जगत् के प्राण महाप्रभु ने आदेश दिया कि सब कीर्तन के लिए एकत्र हों। अपने ही नाम की ध्वनि सुनकर वे आनन्द में भरकर नाचने लगे।

पुण्यवन्त श्रीवास-अङ्गने शुभारम्भ उठिल कीर्तन-ध्वनि ‘गोपाल’ ‘गोविन्द’
अर्थ

पुण्यवान् श्रीवास के आँगन में, श्रीवास ठाकुर के दिव्य प्रांगण में, उन्होंने गूँजती आवाज़ में “गोपाल! गोविन्द!” कहकर कीर्तन की मंगलमय ध्वनि का शुभारम्भ किया।

मृदङ्ग-मन्दिरा बाजे शङ्ख-करताल सङ्कीर्तन-सङ्गे सब हैल मिशाल
अर्थ

आँगन में मृदंग, मंजीरे, शंख, करताल और सुन्दर गायन की ध्वनियाँ सब एक में मिल गईं।

ब्रह्माण्डे भेदिल ध्वनि पूरिया आकाश चौदिकेर अमङ्गल सर्व जय नास
अर्थ

वह ऊँची ध्वनि आकाश को भरती हुई पूरे ब्रह्माण्ड को भेदकर श्वेतद्वीप तक पहुँची और चौदहों भुवनों का सारा अमंगल नष्ट हो गया।

उषः-काल हैते नृत्य करे विश्वम्भर यूथ यूथ हैल जत गयन सुन्दर
अर्थ

सबेरे से ही सम्पूर्ण विश्व का भक्ति से पालन-पोषण करने वाले विश्वम्भर नाचने लगे। गाने वाले सुन्दर दल-के-दल बन गए। हर दल अलग-अलग धुन में मोहक गान कर रहा था।

श्रीवास-पण्डित लैया एक सम्प्रदाय मुकुन्द लैया आर जन-कत गाय
अर्थ

श्रीवास पण्डित एक दल के कीर्तनियों के गुरु थे और मुकुन्द दूसरे दल के मुख्य गायक थे।

लैया गोविन्द घोष आर कत-जन गौरचन्द्र-नृत्ये सबे करेन कीर्तन
अर्थ

गोविन्द घोष एक और दल के प्रधान थे। पूरी कीर्तन-मण्डली के बीच गौरचन्द्र नाच रहे थे।

धरिया बुलेन नित्यानन्द महाबली अलक्षिते अद्वैत लयेन पद-धूलि
अर्थ

महाबली नित्यानन्द प्रभु, जब महाप्रभु नाचते-नाचते मूर्च्छित होते, तो उन्हें थाम लेते थे, और उसी समय अद्वैत आचार्य चुपके से उनकी चरण-धूलि ले लेते थे।

गदाधर-आदि जत सजल-नयने आनन्दे विह्वल हैल प्रभुर कीर्तने
अर्थ

महाप्रभु का कीर्तन सुनकर गदाधर, मुकुन्द, श्रीधर और अन्य सब की आँखों में आँसू भर आए। आठों सात्त्विक भावों के उदय से उनके हृदय आनन्द में विह्वल हो गए।

जखन उद्दण्ड नाचे प्रभु विश्वम्भर पृथिवी कम्पित हय, सबे पाय डर
अर्थ

जब विश्वम्भर बड़े वेग से नाचते थे तो पृथ्वी काँप उठती थी और सब भक्त डर जाते थे।

कखन वा मधुर नाचये विश्वम्भर जेन देखि नन्देर नन्दन नटवर
अर्थ

कभी विश्वम्भर इतना मधुर और सुन्दर नाचते कि लगता मानो नन्द के पुत्र, नर्तकों में श्रेष्ठ नटवर श्रीकृष्ण ही दिखाई दे रहे हों।

अपरूप कृष्णावेश, अपरूप नृत्य आनन्दे नयन भरि’ देखे सब भृत्य
अर्थ

महाप्रभु का सौन्दर्य अनुपम और अतुलनीय है, वह कृष्ण के सौन्दर्य को भी जीत लेता है, कृष्ण में भी महाभाव नहीं है। उनका नृत्य देखकर उनके सब सेवकों की आँखें आनन्द से भर गईं।

निजानन्दे नाचे महाप्रभु विश्वम्भर चरणेर ताल शुनि अति मनोहर
अर्थ

महाप्रभु विश्वम्भर अपने ही आनन्द में डूबकर नाच रहे थे। उनके चरणों की ताल सुनकर भक्त मोहित हो गए।

भाव-वेसे माला नाहि रहये गलाय छिण्डिया पडये गिया भकतेर गाय
अर्थ

भाव के आवेश में नाचते हुए महाप्रभु के गले में माला टिक न सकी। वह टूट गई और सारे फूल भक्तों के चरणों पर जा गिरे।

चतुर्-दिके श्री-हरि-मङ्गल-सङ्कीर्तन मध्ये नाचे जगन्नाथ-मिश्रेर नन्दन
अर्थ

चारों ओर श्री हरिनाम-संकीर्तन की मंगलमय ध्वनि फैली थी, और सब भक्तों के बीच जगन्नाथ मिश्र के पुत्र नाच रहे थे।

जा’र नामानन्दे शिव-वसन ना जाने जा’र रशे नाचे शिव, से नाचे आपने
अर्थ

जिनके नामानन्द में शिव को अपने वस्त्र का होश नहीं रहता और वह गिर जाता है, जिनकी महिमा सुनकर शिव नाचने लगते हैं, उन्हीं महाप्रभु की महिमा सुनकर स्वयं महाप्रभु भी नाचते हैं।

जा’र नामे वाल्मीकि हैला तपोधन जा’र नामे अजामिल पाइल मोचन
अर्थ

इसी नाम से वाल्मीकि को तपस्या का धन मिला, उन्होंने सारी राम-लीला देखी। और इसी नाम से अजामिल के सारे अनर्थ और अपराध जड़ से उखड़ गए।

जा’र नाम श्रवणे संसार-बन्ध घुचे हेन प्रभु अवतारि’ कलि-युगे नाचे
अर्थ

जिनका नाम सुनने से संसार का बन्धन पूरी तरह कट जाता है, ऐसे वे प्रभु कलियुग में अवतार लेकर नाचते हैं। श्रीकृष्ण स्वयं महाप्रभु के रूप में आए, नाचते हुए और सबको कृष्ण-नाम जपने का उपदेश देते हुए।

जा’र नाम लैय शुक-नारद बेडाय सहस्र-वदन प्रभु जा’र गुण गाय
अर्थ

शुकदेव और नारद भी इसी कृष्ण-नाम का जप करते हुए इसे बाँटते घूमते हैं। हज़ार मुखों से प्रभु इस नाम के गुण गाते हैं।

सर्व महा-प्रायश्चित्त जे प्रभुर नाम से-प्रभु नाचये, देखे जत भाग्यवान
अर्थ

जिनका नाम सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है, वे ही प्रभु नाच रहे हैं। उन्हें नाचते देखकर सब भक्त परम भाग्यवान् हो गए।

प्रभुर आनन्द देखि’ भागवत-गण अन्योन्ये गला धरि’ करये क्रन्दन
अर्थ

महाप्रभु का आनन्द देखकर भागवत भक्त एक-दूसरे के गले लगकर ज़ोर से रोने लगे, क्योंकि महाप्रभु के आनन्द की किरणें उनके हृदयों में प्रवेश कर रही थीं।

सबार अङ्गेते शोभे श्री चन्दन-माला आनन्दे गायेन कृष्ण-रसे है’ भोला
अर्थ

सब भक्त कीर्तन में आए और महाप्रभु ने स्वयं उनके अंगों को चन्दन और मालाओं से सजाया। श्रीगौरसुन्दर और भक्तों ने बड़े आनन्द से गाया और कृष्ण-रस का आस्वादन किया।

जतेक वैष्णव-सब कीर्तन-आवेशे ना जाने आपन देह, अन्य जन किसे
अर्थ

कीर्तन के आवेश में सब वैष्णव अपने शरीर की सुध भूल गए, और अपने आसपास के दूसरे लोगों की भी।

जय कृष्ण-मुरारि-मुकुन्द-वनमाली अहर्-निश गाय सबे है’ कुतूहली
अर्थ

“जय कृष्ण, मुरारि, मुकुन्द, वनमाली।” दिन-रात सब भक्त बड़े उल्लास से कीर्तन करते रहे।

अहर्-निश भक्त-सङ्गे नाचे विश्वम्भर श्रान्ति नाहि कार, सबे सत्त्व-कलेवर
अर्थ

विश्वम्भर भक्तों के संग चौबीसों घण्टे नाचते रहे और कभी नहीं थके, क्योंकि उनका शरीर सत्त्व-कलेवर, पूर्णतः दिव्य था।

एइ-मत नाचे महाप्रभु विश्वम्भर निशि अवशेष मात्र से एक प्रहर
अर्थ

प्रतिदिन महाप्रभु पूर्ण प्रेम में कीर्तन करते हुए रात-भर नाचते थे, और सूर्योदय से केवल तीन घंटे पहले ही रुकते थे।

एइ-मत आनन्द हय नवद्वीप-पुरे प्रेम-रसे वैकुण्ठेर नायक विहरे
अर्थ

इसी प्रकार नवद्वीप नगर में आनन्द होता रहा। वैकुण्ठ के नायक प्रेम-रस में विहार करते थे।

ए सकल पुण्य कथा जे करे श्रवण भक्त-सङ्गे गौरचन्द्रे रहु ता’र मन
अर्थ

जो इन सब पुण्य कथाओं को श्रद्धा से सुनता है, उसका मन भक्तों के संग गौरचन्द्र में लगा रहे। इस प्रकार उसका हृदय श्रीवास-आँगन बन जाता है।

श्री कृष्ण-चैतन्य-नित्यानन्द-चाद जान वृन्दावन-दास प्रभु पद-युगे गान
अर्थ

श्रीकृष्ण चैतन्य और चन्द्रमा के समान नित्यानन्द प्रभु को ही मैं अपना प्राण जानता हूँ। वृन्दावन दास कहते हैं, “मैं उनके चरण-युगल की दण्डवत् प्रणाम सहित महिमा गाता हूँ।”

इस भजन के बारे में

पद
29

ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री। सभी भक्त गायकों की जय।