श्री हरि वासरे हरि कीर्तन विधान
एकादशी के दिन जगत् के प्राण महाप्रभु ने आदेश दिया कि सब कीर्तन के लिए एकत्र हों। अपने ही नाम की ध्वनि सुनकर वे आनन्द में भरकर नाचने लगे।
पुण्यवान् श्रीवास के आँगन में, श्रीवास ठाकुर के दिव्य प्रांगण में, उन्होंने गूँजती आवाज़ में “गोपाल! गोविन्द!” कहकर कीर्तन की मंगलमय ध्वनि का शुभारम्भ किया।
आँगन में मृदंग, मंजीरे, शंख, करताल और सुन्दर गायन की ध्वनियाँ सब एक में मिल गईं।
वह ऊँची ध्वनि आकाश को भरती हुई पूरे ब्रह्माण्ड को भेदकर श्वेतद्वीप तक पहुँची और चौदहों भुवनों का सारा अमंगल नष्ट हो गया।
सबेरे से ही सम्पूर्ण विश्व का भक्ति से पालन-पोषण करने वाले विश्वम्भर नाचने लगे। गाने वाले सुन्दर दल-के-दल बन गए। हर दल अलग-अलग धुन में मोहक गान कर रहा था।
श्रीवास पण्डित एक दल के कीर्तनियों के गुरु थे और मुकुन्द दूसरे दल के मुख्य गायक थे।
गोविन्द घोष एक और दल के प्रधान थे। पूरी कीर्तन-मण्डली के बीच गौरचन्द्र नाच रहे थे।
महाबली नित्यानन्द प्रभु, जब महाप्रभु नाचते-नाचते मूर्च्छित होते, तो उन्हें थाम लेते थे, और उसी समय अद्वैत आचार्य चुपके से उनकी चरण-धूलि ले लेते थे।
महाप्रभु का कीर्तन सुनकर गदाधर, मुकुन्द, श्रीधर और अन्य सब की आँखों में आँसू भर आए। आठों सात्त्विक भावों के उदय से उनके हृदय आनन्द में विह्वल हो गए।
जब विश्वम्भर बड़े वेग से नाचते थे तो पृथ्वी काँप उठती थी और सब भक्त डर जाते थे।
कभी विश्वम्भर इतना मधुर और सुन्दर नाचते कि लगता मानो नन्द के पुत्र, नर्तकों में श्रेष्ठ नटवर श्रीकृष्ण ही दिखाई दे रहे हों।
महाप्रभु का सौन्दर्य अनुपम और अतुलनीय है, वह कृष्ण के सौन्दर्य को भी जीत लेता है, कृष्ण में भी महाभाव नहीं है। उनका नृत्य देखकर उनके सब सेवकों की आँखें आनन्द से भर गईं।
महाप्रभु विश्वम्भर अपने ही आनन्द में डूबकर नाच रहे थे। उनके चरणों की ताल सुनकर भक्त मोहित हो गए।
भाव के आवेश में नाचते हुए महाप्रभु के गले में माला टिक न सकी। वह टूट गई और सारे फूल भक्तों के चरणों पर जा गिरे।
चारों ओर श्री हरिनाम-संकीर्तन की मंगलमय ध्वनि फैली थी, और सब भक्तों के बीच जगन्नाथ मिश्र के पुत्र नाच रहे थे।
जिनके नामानन्द में शिव को अपने वस्त्र का होश नहीं रहता और वह गिर जाता है, जिनकी महिमा सुनकर शिव नाचने लगते हैं, उन्हीं महाप्रभु की महिमा सुनकर स्वयं महाप्रभु भी नाचते हैं।
इसी नाम से वाल्मीकि को तपस्या का धन मिला, उन्होंने सारी राम-लीला देखी। और इसी नाम से अजामिल के सारे अनर्थ और अपराध जड़ से उखड़ गए।
जिनका नाम सुनने से संसार का बन्धन पूरी तरह कट जाता है, ऐसे वे प्रभु कलियुग में अवतार लेकर नाचते हैं। श्रीकृष्ण स्वयं महाप्रभु के रूप में आए, नाचते हुए और सबको कृष्ण-नाम जपने का उपदेश देते हुए।
शुकदेव और नारद भी इसी कृष्ण-नाम का जप करते हुए इसे बाँटते घूमते हैं। हज़ार मुखों से प्रभु इस नाम के गुण गाते हैं।
जिनका नाम सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है, वे ही प्रभु नाच रहे हैं। उन्हें नाचते देखकर सब भक्त परम भाग्यवान् हो गए।
महाप्रभु का आनन्द देखकर भागवत भक्त एक-दूसरे के गले लगकर ज़ोर से रोने लगे, क्योंकि महाप्रभु के आनन्द की किरणें उनके हृदयों में प्रवेश कर रही थीं।
सब भक्त कीर्तन में आए और महाप्रभु ने स्वयं उनके अंगों को चन्दन और मालाओं से सजाया। श्रीगौरसुन्दर और भक्तों ने बड़े आनन्द से गाया और कृष्ण-रस का आस्वादन किया।
कीर्तन के आवेश में सब वैष्णव अपने शरीर की सुध भूल गए, और अपने आसपास के दूसरे लोगों की भी।
“जय कृष्ण, मुरारि, मुकुन्द, वनमाली।” दिन-रात सब भक्त बड़े उल्लास से कीर्तन करते रहे।
विश्वम्भर भक्तों के संग चौबीसों घण्टे नाचते रहे और कभी नहीं थके, क्योंकि उनका शरीर सत्त्व-कलेवर, पूर्णतः दिव्य था।
प्रतिदिन महाप्रभु पूर्ण प्रेम में कीर्तन करते हुए रात-भर नाचते थे, और सूर्योदय से केवल तीन घंटे पहले ही रुकते थे।
इसी प्रकार नवद्वीप नगर में आनन्द होता रहा। वैकुण्ठ के नायक प्रेम-रस में विहार करते थे।
जो इन सब पुण्य कथाओं को श्रद्धा से सुनता है, उसका मन भक्तों के संग गौरचन्द्र में लगा रहे। इस प्रकार उसका हृदय श्रीवास-आँगन बन जाता है।
श्रीकृष्ण चैतन्य और चन्द्रमा के समान नित्यानन्द प्रभु को ही मैं अपना प्राण जानता हूँ। वृन्दावन दास कहते हैं, “मैं उनके चरण-युगल की दण्डवत् प्रणाम सहित महिमा गाता हूँ।”
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वृन्दावन दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- पद
- 29
- रिकॉर्डिंग
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री। सभी भक्त गायकों की जय।